Friday, 18 November 2016

नज़्म:-बिजेंद्र सिंह परवाज़

ये नज़्म #बिजेन्द्र_सिंह_परवाज़ ने लिखी है

ज़ख़्म नबी के गिनते गिनते, मेरे आँसू हारे हैं
ये तो बता दो अहले ताईफ़! कितने पत्थर मारे हैं
आपका दर्स हमारे आक़ा, दरियाँओं का दरिया है
ढून्ड़-ढूंड़ कर हारी दुनिया, मिलते नहीं किनारे हैं ।
उन लम्हात के बदले मुझको, सदियाँ भी मंज़ूर नहीं
आपकी यादों के साए में, जो लम्हात गुज़ारे हैं ।
ऐसा खुल-खुलकर बरसा है, अपकी रहमत का बादल
आग लगाने वाले अक्सर, आग लगाकर हारे हैं ।
आप ही अपने रब से कहेंगे, उम्मत की मजबूरी को
आप अगर नाराज़ हुवे, तो दूजे कौन हमारे हैं
जब से नज़र ने झाँक के दिल में, आपकी अज़मत जानी है
तबसे ऐ "परवाज़" नज़र में, मंज़र प्यारे प्यारे हैं ।।

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