Tuesday, 1 November 2016

लोकतंत्र में मीडिया की आजादी ही उसके मजबूत पायों की निशानी है.

क्या सरकार समर्थक राय रखना ही देशभक्ति की निशानी है. सरकार के विरोध में खिसकने का मतलब राष्ट्रद्रोह कब से हो गया? लोकतंत्र में मीडिया की आजादी ही उसके मजबूत पायों की निशानी है. अगर किसी लोकतंत्र में मीडिया को खुलकर बात रखने की आजादी नहीं है तो वह लोकतंत्र भले हो मगर बीमार कहा जाएगा. आज देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है. सरकार को अगर अपनी निंदा सुनने का साहस नहीं है तो वह लोकतंत्र एक तरह का भीड़तंत्र है जिसमें भेड़ें हांकी जाती हैं और ये भेड़ें अपना दिमाग तो रखती नहीं. वे बस वही रास्ता पकड़ती हैं जो लीक उन्हें समझा दी जाती है. इस तरह हमारे देश का डिजिटल संसार यदि रोबोट पैदा कर रहा है तो क्या फायदा होगा. जहां मशीनें तो होंगी लेकिन संजीदा लोग नहीं होंगे. यह एक पूरी पीढ़ी को बरबाद कर देने की तैयारी है जो उनके स्वतंत्र विचार को कुंद कर रही है और इसका खामियाजा आगे आने वाली पीढि़यों को भुगतना पड़ेगा. नीचे एक फोटो है जो मेरी भोपाल एनकाउंटर वाली पोस्ट पर एक टीनेजर लड़के ने डाला, ऐसे अनेक फोरवार्डेड पिक्स डाले, इनके पास खुद का विवेक नहीं होता, ये रोबोट हैं।
बनारस में एक मोहल्ला है अस्सी और इस अस्सी में सामाजिक अड्डेबाजी का ठिकाना है पप्पू चाय की दुकान. पप्पू चाय की दुकान में बैठकर आप दुनिया-जहान की बातें कर सकते हैं और मोदी से लेकर बराक ओबामा तक खुलकर अपनी राय रख सकते हैं. आपको काउंटर करने वाले भी मिलेंगे और आपसे इत्तेफाक रखने वाले भी लेकिन ऐसी अड्डेबाजी फेसबुक पर क्यों नहीं है?  कोई भी विवेकपूर्ण बात सुनने की या पढ़ने की क्षमता धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है. हमारे कान बस वही सुनना चाहते हैं जो हमें पसंद हो अथवा जो हमारी रुचि के अनुसार लिखा गया हो. मगर कुछ वर्षों पूर्व तक ऐसा नहीं था. तब काफी कुछ ऐसा लिखा जाता था जो हमारी धारणा के प्रतिकूल होता था मगर उसे पढ़ा जाता था और सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती थी.
लेखक
देव प्रकाश मीणा
आई आर एस ,भारत सरकार

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