दोस्तों
आज से 3 साल पहले का दिन,30नवम्बर 2013, उर्दू अदब के इतिहास में एक दुखद दिन रहा,हमने खोया उर्दू अदब कि खिदमत करने वाले एक नायब हीरे और एक ऐसी शख्सियत को जिसके शेर वाकई दहाड़ते हैं,जिसका लहजा लोगों के जेहन में उतर जाता हे, और जिसका कलाम शायरी की पाकीजगी को हमेशा अपने अंदर संझोये रहता हे...जनाब मेराज फ़ैज़ाबादी साहब को हमेशा के लिए खो दिया,वो आज हमारे बीच नहीं हैं मगर वो लोगों के जेहन में अल्फाज़ बनकर हमेशा जिन्दा रहेंगे उपरवाला वाला उनको जन्नत अता करे...तो दोस्तों भारी संवेदना के साथ उस अजीम शायर के कुछ कालजयी शेरो से आपको रूबरू करा रहा हूँ जो मुझे बहुत अजीज हैं....
अंधे ख्वाबों को उसूलों का तराजू दे दे
मेरे मालिक अब मुझे जज्बात पे काबू दे दे
में एक कतरा भी किसी गैर के हाथो से ना लूँ
एक कतरा भी समंदर हो अगर तू दे दे
सबके दुःख दर्द सिमट आयें मेरे सीने में
बाँट दे सबको हँसी ला मुझे आँसू दे दे
मैंने आँगन लगा रखे हैं खुशरंग गुलाब
देने वाले मेरे इन फूलों को खुश्बू दे दे
और
रूह का करब भी चेहरे पे सजा लाये हैं
हम खडखाल को आइना बना लाये हैं
अब कोई ठेस लगेगी तो बिखर जायेंगे
जिंदगी तुझको यहाँ तक तो निभा लायेंगे हैं
और क्या देगा ये रिश्तो का थका हार निज़ाम
घर से हम सिर्फ बुजुर्गो कि दुआ लाये हैं
चंद मासूम जिदे दो मुतलाशी आँखे
क्या बताएंगी कि बाज़ार से क्या लाये हैं
मेने जब धुल कि चादर से ये तन ढ़ाप लिया
लोग मेरे लिए फूलों कि कबा लाये हैं
और
मेरे लब्जो को मुहब्बत कि गवाही मिल जाये
मुझको भी मुमलकत-ए-शेर कि शाही मिल जाये
में भी खुशरो कि तरह शेर कहूं रखस करूँ
काश मुझको भी कोई मेहबूब-ए-इलाही मिल जाये
और
मुझको थकने नहीं देता ये जरूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
और
राजमहलों से खड्गता रास्ता हो जायेगा
हम फकीरो से जो उलझेगा फनाह हो जायेगा
तू खुद का नाम लेकर घर से निकला हे तो फिर
बहते दरिया में उतर जा रास्ता हो जायेगा
वो भी दिन थे यार कि हम दोनों कितने नजदीक थे
किसने सोचा था कि इतना फासला हो जायेगा
और
बेखुदी में रेत के कितने समंदर पी गया
प्यास भी क्या सयहे में घबराके पत्थर पी गया
मैकदे में किसने कितनी पी ये तो खुद जाने मगर
मैकदा तो मेरी बस्ती के कई घर पी गया
और
झील आँखों को नम होटो को कमल कहते हैं
हम तो झखमो कि नुमाइश को ग़ज़ल कहते हैं
और
वो शख्स सूरमा हे मगर बाप भी तो हे
रोटी खरीद लाया हे तलवार बेचकर
जिसके कलम ने मुद्दतों बोये हैं इंकलाब
अब पेट पालता हे वो अखबार बेचकर
कांपी जरा जमीन कि सब ख़ाक हो गया
हमने महल बनाये थे मीनार बेचकर
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Amazing 👏🤘🤘🤘☝☝...👌👌
ReplyDeleteAmazing
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