Sunday, 6 November 2016

डिंगरहेड़ी ,इतना सन्नाटा क्यों?

मैं अभी सोच ही रहा था,
मिन्हाज़,अख़लाक़,मोहसिन,की तरह डिंगरहेड़ी भी शायद बिलकुल खामोश फ़ाइल हो गयी।
अब अल्मीराह में ये धुल फ़ांकेंगी,25-30साल बाद फिर कूड़े में जल जायेगी,मगर बलात्कार होता रहेगा हर रोज उन बेटियो के साथ जो इस जुल्म की मारी हुयी है,2-2 मौत के ख़ौफ़नाक मंजर घूमते रहेंगे उन आँखों के सामने जो कभी वेहस्त ओ दहशत की गवाह भी थी।गुंजतीं रहेगी उस 6माह के बच्चे की चीख जिसको उल्टा लटकाकर एक माँ को मजबूर किया गया अस्मत दरी के लिए।वो रास्ते ख़ौफ़ का पर्याय बने रहेंगे जब तक जिंदगी रहेगी ।वो रात हर रात मौत बनकर रोज मारेगी।और सिसकिया,रूदाद,आहें,दब के रह जायेगी,दुनिया की अनदेखी के शोर में।जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।

न सबूत,न हथियार बरामदगी,न कबूलनामा,ऐसा लगता है जंगली इंसानी खून और बेटियो के जिस्म के प्यासे फिर से आज़ाद होकर मंडराने लगेंगे,किसी और शिकार के लिए,किसी और की दुनिया में क़हर बरपाने के लिए।

और देखती रह जाएंगी आँखे,जुल्म और ज़ालिम का नँगा नाच।

मालूम नही क्या हो रहा है

काश कुछ हो मिले रूदाद ओ आहो को भी सदा,
के काश कोई उभरे आवाज़ और हिला दे आसमाँ
,
के काश कोई आये रौशनी लेके हक़ की
के काश अदालत ऐ शहर सुने जुबा हक़ यहाँ।

के कहीं तो लेगी जुल्म को फांसी
के कहीं तो गूंजे इन्साफ की पुकार
के कहीं तो उभरे शिकन माथे पे
के कहीं तो लटके फांसी पे वो चार।

नदीम खान मामलीका

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