3 तलाक़ का मसला सरकार का नही हमारा है,मोदी न ही बोले तो अच्छा है,उनका राजधर्म हम गुजरात में देख चुके है।
लेकिन
मेरी उलेमाओं से और तमाम मुस्लिमो से ये जरूर दरख्वास्त है बराए मेहरबानी मेरी राय पे गौर ओ फ़िक्र जरूर करियेगा।
कई मुआमलात में ये देखने को मिला है के मुस्लिम भाइयो ने अलफ़ाज़ और हुक़ुक़ ऐ शरीयत का गलत इस्तेअमाल किया है,उन्हीने न खुदा का ख़ौफ़ रखा और न ही ख़ौफ़ ऐ शरीयत रखा।
शरीयत मर्द को हुक़ुक़ देती है,ज्यादती का नही,लेकिन ज्यादतियों में मुआमले ने मजबूर किया कौम की बेटियों को अदालतों में मसअला ले जाने के लिए।क्या बेहतर नही होता जब पंचायते या अदालतों में मसला पहुँचने से पहले खुद मुस्लिम लॉ बोर्ड समिति बनाता और हुक़ुक़ का गलत इस्तेअमाल करने वालो को शरीयत की अहमियत समझा कर उन्हें गलतियों से रोकता।
बेशक,ये सच है,मुस्लिमो में ख़ौफ़ ऐ खुदा है,और ये भी सच है के सबसे कम तलाक़,सबसे कम मुस्लिमो में ही होते है,जबकि हिन्दुओ में करीब 4गुणा तलाक प्रतिशत में है।
लेकिन हिन्दुओ की बुरी स्तिथि का अर्थ ये नही के हम अपने समाज में व्याप्त बुराई पर नज़र न डाले,जरूरत है उन लोगो को शख्ती से सजा देने की,खुद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को शख्ती दिखाते हुए उन लोगो को सज़ा दिलाने के लिए पहल करनी होगी जो व्हाट्सएप्प,मैसेज,फोन पे तलाक दे रहे है,और उन उलेमाओं पे भी जो इसके हक़ में फतवे दे चुके है,और उन परिवारों पे भी जो इसे कबूल कर रहे है।
इस्लाम की गलत छवि बनाने वाले लोगो को नज़रअंदाज़ करना आज इस्लाम से नफरत करने वालो को एक ऐसा बहाना दे रहा है जिससे वो लोग इस्लाम की खूबियों को नजरअंदाज करके ऐसी बेवकूफियों को उछाल रहे है।
मैं बेख़ौफ़ हु,सबसे,सिर्फ हक़ की ताईद करता हु,शाह बानो वाले मसले में भी कौम ने सिर्फ अपनी जाहिलियत दिखाई थी,अगर हुक़ुक़ का गलत इस्तेअमाल होता रहा तो याद रखे,यकीनन न केवल औरते बल्कि मर्द भी खुली बगावत पे आ जायेंगे।
वो लोग जो औरतो की बलि देते है,विधवा औरतो को जिन्दा आग में झोंक देते है,सफेद कपड़ो में लपेट कर झूठन खाने और मनहूस कहकर औरत को हमेशा प्रताड़ित करते है,वो लोग जो दहेज की लालसा में औरतो को आग लगा देते है,बेटियो को कोख में मार गिराते है,औरत को ताडन का अधिकारी बताते है,अपवित्र और बुराई की जड़ कहते है,दोयम दर्जे की वस्तु समझते है,भोग का साधन समझते है,पति के चरणों की धूल समझते है,देवदासी समझते है,उनको शिक्षा देना वेद विरुद्ध समझते है,औरत का मंदिर जाना उन्हें स्वीकार्य नही,हज़ारो बीवियां रखने वाले,जो लोग औरत की नग्नता को महानता कहते है आज वो लोग बहुत सी बुराइयों से आगे बढ़ गए है,तो हम तो 14सदियों से आगे है,हम उन्हें कैसे मौका दे रहे है सवाल उठाने का??चन्द लोगो की गलतियों की वजह से आज पूरी कौम कटघरे में है,हमे रोकना होगा,दीन को तमाशा बनने से।
आज कुछ चन्द लोगो की वजह से ज़ाहिल हमे पिछड़ा और खुद को आधुनिक कह रहे है।
आप ने औरत को समानता का अधिकार दिया,शिक्षा,जीवन,जायदाद आदि सभी अधिकार इस्लाम ने दिए,लेकिन आज जब कुछ चन्द लोग शरीयत का मज़ाक उड़ाते है तो ख़ामोशी क्यों???
इस्लाम में कोई बदलाव नही कर सकता और न ही हम स्वीकार करेंगे लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को आज ये सोचना होगा जो शरीयत कि इज्जत न करके शरीयत का मज़ाक उड़ा रहे है उनके साथ मुस्लिम समुदाय का रुख कैसा होना चाहिए???
तलाक़ की कई तरकीब है,ज्यादातर तलाक़ ऐ अहसन से इत्तिफ़ाक़ भी रखते है,मैं खुद भी,क्या इसीको ग़ालिब किया जाये ,सोचिये किसी भी नुक्ता ऐ नज़र लेकिन जरूरत है आज़ सोचने की?????
मैं नही चाहता कोई इस्लाम से नफरत करने वाले इस्लाम पे सवाल खड़े करे, इस्लाम की पाकीज़गी के लिए ये सोचना बहुत जरूरी है,कहीं कोई इसके दिए हुक़ुक़ का गलत इस्तेमाल न करे।
इसी दरख्वास्त के साथ अपनी बात खत्म करता हु,कोई बात गलत लगी हो तो माफ़ किजियेएगा,मेरी नियत बुरी नही।
अल्लाह हाफ़िज़
नदीम खान मामलीका
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