Sunday, 30 October 2016
मोदी जी को दिवाली की मुबारकबाद के बहाने कश्मीरी शायर का ख़त
सेवा में,
श्री नरेंद्र भाई मोदी जी
मोदी जी आदाब! काफी दिनों तक सोच-विचार करने के बाद आप को एक खुला खत लिखने बैठा हूं। हो ये भी सकता था कि इसको निजीतौर पर लिखकर पीएम ऑफिस को पोस्ट कर देता। लेकिन आजकल आप मीडिया के जरिए ही संवाद कर रहे हैं तो यही तरीका सही लगा। नीयत ये भी है कि इंडिया की जनता भी वह बातें जाने जो मीडिया अक्सर उनको बताता नहीं। आपको दिवाली की शुभकामनाएं देते हुए इस बात की उम्मीद करता हूं कि आप मेरे इस खत का नोटिस जरूर लेंगे।
मोदी जी, आज करीब चार महीने हो गए, कश्मीर बंद है। सड़क, चौराहे, खेल के मैदान, स्कूल, झीलें, पहाड़, बाग, रेलवे ट्रैक और एयरपोर्ट सब वीरान पड़े हैं, सिवाय अस्पतालों के। अगर कहीं भीड़ है तो उन चौकों पर, जहां पुलिस, सीआरपीएफ, सेना और आम कश्मीरी लड़के आमने-सामने हैं। पत्थर, पैलेट, खून, चेहरों के नकाब, मातम, कब्रें, जनाजे यहां पर प्रोटेस्ट के सबसे मजबूत प्रतीक बन चुके हैं। कश्मीर अफेयर्स देखने वाले आपके करीबी राजदार और एजेंसियों वाले आप को रोजाना रिपोर्ट देते ही होंगे। उन रिपोर्ट्स में यही लिखा रहता होगा कि आज कितने मिलिटेंट मारे गए, कितनी पुलिस चौकियां जलीं, कितने कश्मीरी लड़के मरे, कितने अंधे या जख्मी हुए। आप एक नजर फाइल पर डालकर उसे आगे बढ़ा देते होंगे। शायद दुखी होते होंगे (या नहीं भी) और फिर दुबारा किसी काम में जुट जाते होंगे।
मोदी जी, ये सिर्फ आंकड़े हैं जो हर नए साल के प्रोटेस्ट में घटते-बढ़ते रहते हैं। कभी बीस दिन कर्फ्यू, कभी तीन महीने, कभी 100 जवान मरते हैं कभी 120। ये आंकड़े हर नए मौसम में बस बदलते रहते हैं। डेलिगेशन आते हैं, कमीशन बैठते हैं, ट्रैक-टू डिप्लोमेसी के ठेकेदार गुश्ताबे और वाजवान डकार के वापस दिल्ली उड़ जाते हैं। नेशनल और इंटरनेशनल मीडिया की ओवी वैन्स भी दिल्ली लौट जाती हैं। कश्मीर वहीं रह जाता है अपनी टीसों, चोटों और जख्मों के साथ। मीडिया वह सब बता देता है जो उन्हें पीएमओ की पीआर एजेंसी ने फीड किया होता है। इसी ढर्रे पर कुछ साल-महीने गुजरते हैं। हालात फिर वैसे के वैसे। जब तक कोई नई चिंगारी भड़क के शोला नहीं बन जाती।
मोदी जी, आपको मालूम है इस बार जो लड़के सड़कों पर हाथ में पत्थर संभाले उतरे हैं, उनकी औसत उम्र क्या है? पंद्रह से बीस साल। यानी यह वो लड़का है जिसने कश्मीर स्ट्रगल का वह रूप देखा ही नहीं जिससे उसके मां-बाप, बड़े-बुज़ुर्ग गुजर चुके हैं। इसने बस सुना भर है कि उसके डैडी, अंकल या भाई एनकाउंटर में मारे गए थे या उनको किसी रात आर्मी उठा ले गई थी और वो कभी वापस नहीं लौटे। या फिर इंडिया के साथ जिहाद करते हुए शहीद हो गए थे।
मोदी जी, हर बात अजीत डोवाल नहीं बताते, बुहत कुछ इलाके के एसएचओ और मस्जिद के इमाम से भी जाना जा सकता है। हाथों में पत्थर उठाए, कैमरे से अपने नकाब पहने चेहरे को बचाता हुआ वह लड़का जिसे इंडिया से नफरत है, उसे गिलानी और पाकिस्तान से भी शिकायतें हैं। वह अच्छे से जानता है कि इन तीनों ताकतों ने मिलकर उसका और उसके परिवार का वक्त जाया किया है। ये तो माओं के पाले-पोसे, जीन्स पहनने वाले स्मार्ट लड़के हैं जिनके रोल-मॉडल सलमान खान, परवेज रसूल, आईएस टॉपर शाह फैसल और शाहरुख खान हैं। ये लोग अरिजीत, राहत फतेहअली और हनी सिंह के गाने सुनकर जवान हुए हैं।
मोदी जी, आज इन लड़कों का रोल मॉडल बुरहान वानी इसलिए है क्योंकि ये जाने-अनजाने एक ऐसे मसीहा की तलाश में हैं जो इनके भविष्य को सुरक्षित करने में इनकी मदद करे। सो अबकी इन्हें इक्कीस साल के एक इंजीनियर लड़के में वह हीरो मिल गया जिसके हाथ में एप्पल की जगह चमचमाती एके-47 थी। जिसके मुजाहिद भाई को कुछ साल पहले इंडियन आर्मी ने मारा था, जो बेखौफ होकर अपने वीडियो यू-ट्यूब पर अपलोड करता था, जिसको धोखे से मारा गया. इन्हीं में दूसरा तबका वो है जो पढ़ नहीं पाया। बेरोजगार रह गया। सूमो, ऑटो, शिकारा चलाता है. सन्डे मार्केट में डल के किनारे सैलानियों को फेरन बेचता है।
ये वह तबका है, जो गिलानी के कैलेंडर को भी नहीं मानता। यासीन मालिक, शब्बीर शाह और उमर फारूक को (उनकी मर्जी से ही) नजरबंद रहने पे मजबूर करता है। न किसी की सुनता है न किसी की मानता है। इसका न कोई लीडर है, न इसका कोई चेहरा है। इसकी दुनिया उतनी है जितनी एंड्रॉयड मोबाइल की स्क्रीन में समाती है।
मोदी जी, इस कश्मीर के ताजा प्रोटेस्ट में शामिल हुए इन नौसीखिए जवानों के साथ कभी बात कीजिए तो ये सवालों के अजीब-ओ-गरीब आधे-अधूरे जवाब देते हैं।
मुझे इंडिया के साथ नहीं रहना।
पाकिस्तान चोर है।
पाकिस्तान जिंदाबाद।
गिलानी ने हमारा सौदा किया है।
गिलानी जिंदाबाद।
बुरहान वानी का खून जाया नहीं जाएगा।
महबूबा, उमर, आजाद ये सब दिल्ली के पिट्ठू हैं।
मोदी मुसलमानों का दुश्मन है। इसे सबक सिखाना जरूरी है।
हम छीनके लेंगे आजादी।
बस अब बहुत हो गया…अबकी बार आर या पार।
मोदी जी, इन दंगाई लड़कों का न कोई चेहरा है, न लीडर, न कोई ऑफिस है और न कोई स्टेज। इनमें गुस्सा है, घुटन है, प्रोटेस्ट है, जनून है। अपनों के खिलाफ, गैरों के खिलाफ, इंडिया के खिलाफ, पाकिस्तान के खिलाफ, हुर्रियत के खिलाफ। ये आइडेंटिटी क्राइसिस की मारी हुई वो नस्ल है जो कुछ महीने जेहनी तौर पर इंडिया के साथ ग्रो करती है। आईएस टॉपर शाह फैसल और क्रिकेटर परवेज रसूल को रोल मॉडल मान लेती है। दूसरे महीने पाकिस्तान से उम्मीद वाबस्ता कर लेती है। एक दिन खुदमुख्तारी का ख्वाब देखकर आजादी के गीत गाती है। दूसरे दिन बुरहान वानी की तरह बंदूक उठाकर बॉर्डर पार जाने को आमादा है। इसको कुछ नहीं सूझता। ये इंडिया में सलमान, शाहरुख, जावेद अख्तर, आमिर खान को मिल रही मोहब्बत से खुश भी होती है और ये भी चाहती है कि विराट कोहली को शोएब अख्तर बार-बार क्लीन बोल्ड करे। इनके मन में सचिन और अमिताभ के लिए इज्जत भी है, लेकिन इसे नुसरत और राहत की कव्वाली भी सुननी है। नए यूथ का ये रिप्रजेंटेटिव इंडियन है पर इंडियन नहीं, पाकिस्तानी है पर पाकिस्तानी नहीं, कश्मीरी है पर कश्मीरी नहीं।
ये पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा तो लगा सकता है, लेकिन भारत माता की जय जैसी कोई चीज इसके जेहन में नहीं है। इन सबके पास रिलायंस के जिओ का फोर-जी सिम भी है, और स्कूल की बिल्डिंग के लिए सड़क किनारे से उठाया नुकीला पत्थर भी। जिनके हाथ में पत्थर नहीं है उनके दिल में पत्थर है। आर्मी की भर्ती की दौड़ में पीछे रहने वाला, आर्मी की गाड़ी पर पत्थर फेंकने वालों में सबसे आगे है।
ये लड़के आर्मी की चौकी को घेरकर उसपर पेट्रोल बम भी फेंकते हैं, लेकिन कहीं आर्मी की गाड़ी पलट जाए तो उसमें फंसे जवानों को निकालने के लिए भी पिल पड़ते हैं। ब्लड बैंक के लिए खून भी देते हैं, और सैलाब में फंसे बिहारी को भी निकालते हैं। अमरनाथ यात्री को तब तक अपने घर में रोके रखते हैं जब तक चौक में पुलिस पर हो रहा पथराव थम न जाए। मुहल्ले में अकेले पड़े कश्मीरी परिवार के बूढ़े का शव अपने कांधे पर श्मशान तक भी ले जाते हैं और पंडित लड़के की शादी में डांस भी करते हैं।
हर शहर-गली-मुहल्ले में देश का जवान ऐसा ही होता है, कश्मीर का भी ऐसा ही है। ये आज के मोदी के भारत में शायद नहीं रहना चाहता है। लेकिन इंडिया के करीब रहना चाहता है। ये वो मासूम ठगा हुआ जज्बाती तबका है जिसको कुछ सूझ नहीं रहा कि आखिर उसका भविष्य क्या है? ये सबको गाली देता है। शेख अब्दुल्ला को भी। गिलानी को भी। मुफ्ती को भी। मोदी को भी। पाकिस्तान के साथ जाते हुए खौफ खाता है। आज वाले इंडिया के साथ रिलेट नहीं कर पा रहा। आजादी और अंदरूनी खुद-मुख्तारी की रूप-रेखा से कतई नावाकिफ है। इसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा। आज जबकि सारी दुनिया 2030/2040 के प्लान बना रही है, इसको यही इल्म नहीं है कि 2021 में कश्मीर की जमीनी सूरते-हाल क्या होगी?
वो इसी इंडिया में होगा?…Shit
वो पाकिस्तान में होगा…Ohh
वो आजाद होगा… hahaha
ये एक बड़ी उलझी हुई जहनी कैफियत है। पूरी नस्ल बीमार हो चुकी है। ये टिक-टिक करता हुआ एटम बम है जिसके तीन चार दावेदार निकल आये हैं। पाकिस्तान था ही, अब चाइना भी है। इसको वक्त रहते डीफ्यूज कीजिए। अबकी इसके हौंसले पस्त नहीं हैं। ये लोग इंडिया से नफरत करते-करते बुहत दूर निकल आये हैं। ये सब एटॉमिक प्लांट हैं। इनकी सुनिए। इनको एड्रेस कीजिए। इज्जत और सम्मान दीजिए। ये लाड़-प्यार को तरस चुके बच्चे की तरह हैं। आप शायद जंग से जमीन का टुकड़ा जीत लेंगे पर इनके दिल नहीं जीत सकते। याद रखिए, जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता वो दुनिया का सबसे घातक हथियार है।
मोदी जी, आप सोचते होंगे कि मैं ये खत आप ही को क्यों लिख रहा हूं। नवाज, गिलानी या महबूबा मुफ्ती को क्यों नहीं। इसलिए कि सारे इंडिया की तरह कश्मीर की नई नस्ल भी ये बात अच्छे से जानती है कि मोदी के होते कुछ भी मुमकिन है। इनको इस बात का अहसास है कि सालों बाद एक ऐसा शख्स सामने आया है जो मुश्किल फैसले लेने की हिम्मत दिखा रहा है। एक ऐसा शख्स जो बगैर हो-हल्ला किए जंगी नफरत के माहौल में भी चाय पीने के बहाने नवाज शरीफ के घर में लैंड कर जाता है।
मोदी जी, आप सैलाब के बाद लगातार महीने के महीने कश्मीर आए। आपने अपने तीज-त्यौहार यहां मनाए, सैलाब के वक्त अपनी सारी आर्मी वैली में झोंक दी। ये सब कुछ इतिहास के पन्नों में मौजूद है। इतिहास में सब महफूज रहता है। अच्छा भी, बुरा भी। आपके साथ गोधरा भी चलेगा, लाहौर भी। लेकिन मोदी जी, इस सबके बावजूद हैरत है कि आज जब करीब चार महीने से कश्मीर बंद पड़ा है, आपने एक बार भी इन लोगों को विजिट करने की नहीं सोची। क्या आप तभी आएंगे जब आपको वोट चाहिए होंगे? फिर आपमें और फारूक अब्दुल्ला में क्या फर्क रहा?
आप का मुहब्बत भरा 140 अक्षर का एक खूबसूरत ट्वीट, सारा माहौल बदल कर रख सकता था। लेकिन आपकी उंगलियां थर-थर कांप जाती हैं। अगर आप हमेशा यूपी बिहार बंगाल पंजाब के चुनाव देखते रहेंगे तो ऐतिहासिक काम नहीं कर पाएंगे। आपने अकेले दम पर चुनाव जीता, लेकिन अब सबका सब नागपुर कर रहा है। आपकी एक स्पीच ने बलवावादी साधू संतों योगियों को सीन से बाहर कर दिया। गोरक्षा, घर-वापसी, लव-जिहाद सब ठिकाने लग गया आपकी एक लताड़ से। लेकिन कश्मीर पर आप खामोश क्यों हैं?
जब कौमों में आक्रोश होता है, अपनों में नाराज़गी होती है, उसे मोटे बजट और रोजगार से दूर नहीं किया जाता। प्यार और मोहब्बत का नेक नीयती भरा हाथ बढ़ाना होता है। कश्मीरी बड़ा गैरती है। वो हर रोज हजार बारह सौ की रसोई पकाता है। साल भर मार्केट बंद रखने का साहस करता है। अपने फल अपनी फसलों को साल के साल जाया जाने देता है लेकिन लेकिन अपने काज का सौदा नहीं करता।
मोदी जी, आप जानते हैं बुरहान की मौत और इन सौ से ज्यादा मरने वाले लड़कों की मौत के बाद क्या हुआ?
इंडिया के साथ खड़े होने वाले मुस्लिम्स का एक बुहत बड़ा गैर-कश्मीरी तबका कश्मीरी के साथ चला गया। पूरे पीर पंजाल के डिस्ट्रिक्ट, चिनाब वल्ली के मुस्लिम डिस्ट्रिक्ट, जम्मू और लद्दाख के मुस्लिम बहुल डिस्ट्रिक्ट ब्लाक और तहसीलें आज कश्मीर की टोन में बात करती हैं। आखिर इंडिया का ये नुकसान क्यों हुआ? किन्होंने करवाया? जमीनी सूरत यह है कि अबकी बार, इंडिया ने वो नेशनलिस्ट मुस्लिम फोर्सेस (गुज्जर/पहाड़ी/डोगरी/कश्मीरी) भी गंवा दीं जो अभी दो साल पहले तक इंडिया के साथ हुआ करती थीं। यही वो लोग थे जिन्होंने आपकी लहर के वक्त बीजेपी को 25 सीटें जितवा के कश्मीर की हुक्मरानी का ताज दिया था। वही कारगिल, जो पाकिस्तान के साथ युद्ध के वक्त इंडियन आर्मी के साथ खड़ा था, आज कश्मीरी नौजवानों की मौत पर प्रोटेस्ट रैलियां मना रहा है। मोदी जी, आपने तेजी के साथ ग्राउंड खोया है। इंडिया के लिए ये सब अलार्मिंग है।
मोदी जी, आखिरी बात। आप सोचिए तो सही कि बीजेपी और आरएसएस से नफरत करने वाला मुसलमान आखिर अटल बिहारी वाजपेयी जी से नफरत क्यों नहीं कर पाया? कुछ तो था अटल में ऐसा जो आप में नहीं है। क्या है वो? आप अच्छे से जानते हैं। उसकी दोबारा खोज कीजिए। अपने लिए, अपने महान देश भारत के लिए। आप हिस्ट्री के बहुत खूबसूरत मोड़ पर आ खड़े हुए हैं।
आप कश्मीर को सच्चे मन से एड्रेस कीजिए। आम कश्मीरी के पास इंडिया अभी भी एक सुरक्षित विकल्प है। लेकिन वो ये वाला इंडिया नहीं है। जहां मुसलमान बात करते हुए भी खौफ खाने लगा है। जहां मुस्लिम को कदम कदम पर एक हिंदू से प्रमाणपत्र लेना पड़े। भारत एक देश मात्र नहीं है। जमीन का टुकड़ा नहीं है। एक हजारों साल में फैली प्यार मुहब्बत की सभ्यता है। इसके ऐतिहासिक डिस्कोर्स को आपके हिस्से में आये ये छह-आठ वर्ष नहीं बदल सकते।
मोदी जी, मौत का यह नंगा नाच बंद करवाइए। आप कर सकते हैं। आप दंगों के जानकार हैं। आप नफरत की इस मानसिकता को समझते हैं। लगाम कसिए इन सब पर। अगर इस वक्त चूक गए तो आपका इंडिया सालों के लिए पटरी से उतर जाएगा।
जनाब, मन की बात में घंटों बोलने का क्या फ़ायदा, जब उन्ही मुद्दों पे बात ना की जाए जो आम-अवाम को राहत पहंचा सकें। गुजरे सैलाबी दिनों में कश्मीर के दर्जनों लड़कों ने सेंकड़ों लोगों को डूबने से बचाया। कुछ लड़के बह कर मर भी गए। क्या आपने कभी उन को नेशनल मीडिया में जगह दी? किसी राष्ट्रीय वीरता सम्मान से नवाजा? आप क्यों ऐसे मौके गंवा देते हैं? कैसे आम कश्मीरी आपसे रिलेट करेगा और क्यों करेगा? इंसानियत, कश्मीरियत, जम्हूरियत जैसे तमाम स्लोगन बेमानी हैं। विकास और विश्वास चुनावी नारे हैं।
जुमलेबाजी तज दीजिए। आपके पास समय कम है। प्लीज हौसला कीजिए। पाकिस्तान के हाथ लगे इस सबसे बड़े पत्ते को नकारा कर सकते हैं आप। कश्मीरी को मान-सम्मान-प्यार से एड्रेस कीजिए। मुस्लिम की खोयी शिनाख्त को वापस लौटाने में अपना योगदान दीजिए। इंडिया का बाईस करोड़ मुस्लिम आपका आभारी होगा।
एक बार फिर खुशियों और रोशनियों का त्यौहार दिवाली मुबारक!
आपका आभारी
एक आम कश्मीरी
डॉ. लियाकत जाफरी
उर्दू शायर एवं सांस्कृतिक कार्यकर्ता, पुंछ, जम्मू
शक्ति विश्वास की
अक़ीदे की ताकत :
खुदा पर अकीदा (आस्था) इन्सान को इस दुनिया में सबसे बड़ा सहारा देता है। ख़ुदा पर अकीदा, विश्वास का सबसे बड़ा स्रोत है। यह दुनिया समस्याओं की दुनिया है। यहां हर औरत और मर्द को बार बार समस्यायें आती हैं। अक्सर ऐसी परिस्थितियां आती है कि जहां आदमी अपने आप को बेबस महसूस करने लगता है।
ज़िन्दगी के सफर में बार बार आदमी को एेसा महसूस होता है कि आगे का रास्ता बन्द है। बार बार इंसान इस तरह कि नकारात्मक भावनाओं से दो चार होता है कि उसके संसाधनों और सूत्रों की अंतिम सीमा आ गई , खुद अपने बल पर अब अपनी समस्या को हल करना नामुमकिन हो गया, आदि।
जिस आदमी का ख़ुदा में अक़ीदा न हो, वह एेसे मौके पर मायूसी का शिकार हो जाता है। वह आहत होकर बैठ जाता है। उसको महसूस होता है कि अब उसके अन्दर आगे बढ़ने की हिम्मत नही । एेसी हालत में पहुंच कर आदमी टेंशन में जीने लगता है, और टेंशन अपने आप में सारी बीमारीयों की जड़ है। हकीकत यह है कि टेंशन से ज़्यादा बड़ी कोई समस्या इन्सान के लिये नही।
लेकिन जिस आदमी को ख़ुदा के ऊपर सच्चा यक़ीन हो, वह कभी मायूसी का शिकार नही होता। उसको हर स्थिती में यह यकीन रहता है कि उसका ख़ुदा ज़रूर उसकी मदद करेगा ।
एेसा आदमी पूरे विश्वास के साथ यह समझता है कि उसका ख़ुदा ज़रूर उसकी डूबती हुई नाव को बचा लेगा, उसका ख़ुदा उस समय भी जरूर उसका साथ देगा जबकि दूसरे लोग उसका साथ छोड़ चुके हों ।
(उर्दू मैग्ज़ीन अलरिसाला : Nov. 2010)
[ अनुवादक : फहीम मसूद किदवाई ]
Thursday, 27 October 2016
जरूरी संदेश नदीम खान मामलीका की क़लम से
मेरा सपना है,एक ऐसे आज़ाद भारत का जहाँ लोग एक दुसरो से मजहब,रंग,नस्ल,दौलत या अन्य किसी और भी बात से नफरत न करे।
यहाँ मैं प्रेम की पवन को बिना किसी की रुकावट के बहते हुए देखना चाहता हु,गंगा जमुनी तहजीब का भाईचारा अमर देखना चाहता हु,हसन खा मेवाती,राणा सांगा का मातृप्रेम,महारानी कर्णावती और सम्राट हुमायूँ की राखी की डोर,हकीम पठान और राणा प्रताप का साथ,अकबर और मानसिंह की वचन शैली,राधे और कृष्णा का प्यार,राम का त्याग और चिश्ती का सन्देश,नानक की वहदत,हीर रांझे के किस्से,मोहन और बाबा फरीद की बोली,मैं एक ऐसा राम राज्य देखना चाहता हु,जिसके अमन और इंसाफ को देख कर हिन्दू को खिलाफत ऐ राशिदीन का दौर याद आये और मुस्लिम को राम राज्य।मैं देखना चाहता हु ऐसा भारत जहाँ लोग धर्म के नाम पे एक दूसरे के प्यासे न हो,बल्कि एक दूसरे के हमदर्द बने भाई बने।ये वो पाक सरजमीं है जहाँ हज़रत निजामुद्दीन पैदा हुए तो कहीं गुरु नानक,इस पवित्र मिटटी की खुसबू में आज भी मुहब्बत की महक है।दुनिया कहने लगे अगर मुल्क हो तो भारत जैसा।काश ये हो जाये,काश मैं अपने जीते जी वो दिन भी देख सकू, जब दीवाली और ईद सबके हो जाये।
तुम सब दोगे न मेरा साथ,मुझे आप सबका साथ चाहिए,मेरा यकीन करना,हम महान भारत के वासी फिर से अपने मुल्क को सोने की चिड़िया बनागे, और ये फिर होगा महान भारत,जहाँ कोई बेरोजगार,भूखा, गरीब,दुखी,भरस्टाचारि नही होगा।
तुम मेरा साथ दो,मैं तुम्हे सोने का भारत दूंगा।।
अपील कर्ता,
नदीम खान मामलीका
मुंशी प्रेमचंद जी कें शब्दो में इस्लाम
‘‘...जहाँ तक हम जानते हैं, किसी धर्म ने न्याय को इतनी महानता नहीं दी जितनी इस्लाम ने। ...इस्लाम की बुनियाद न्याय पर रखी गई है। वहाँ राजा और रंक, अमीर और ग़रीब, बादशाह और फ़क़ीर के लिए ‘केवल एक’ न्याय है। किसी के साथ रियायत नहीं किसी का पक्षपात नहीं। ऐसी सैकड़ों रिवायतें पेश की जा सकती है जहाँ बेकसों ने बड़े-बड़े बलशाली आधिकारियों के मुक़ाबले में न्याय के बल से विजय पाई है। ऐसी मिसालों की भी कमी नहीं जहाँ बादशाहों ने अपने राजकुमार, अपनी बेगम, यहाँ तक कि स्वयं अपने तक को न्याय की वेदी पर होम कर दिया है। संसार की किसी सभ्य से सभ्य जाति की न्याय-नीति की, इस्लामी न्याय-नीति से तुलना कीजिए, आप इस्लाम का पल्ला झुका हुआ पाएँगे...।’’
‘‘...जिन दिनों इस्लाम का झंडा कटक से लेकर डेन्युष तक और तुर्किस्तान से लेकर स्पेन तक फ़हराता था मुसलमान बादशाहों की धार्मिक उदारता इतिहास में अपना सानी (समकक्ष) नहीं रखती थी। बड़े से बड़े राज्यपदों पर ग़ैर-मुस्लिमों को नियुक्त करना तो साधारण बात थी, महाविद्यालयों के कुलपति तक ईसाई और यहूदी होते थे...।’’
‘‘...यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस (समता) के विषय में इस्लाम ने अन्य सभी सभ्यताओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है। वे सिद्धांत जिनका श्रेय अब कार्ल मार्क्स और रूसो को दिया जा रहा है वास्तव में अरब के मरुस्थल में प्रसूत हुए थे और उनका जन्मदाता अरब का वह उम्मी (अनपढ़, निरक्षर व्यक्ति) था जिसका नाम मुहम्मद (सल्ल॰) है। मुहम्मद (सल्ल॰) के सिवाय संसार में और कौन धर्म प्रणेता हुआ है जिसने ख़ुदा के सिवाय किसी मनुष्य के सामने सिर झुकाना गुनाह ठहराया है...?’’
‘‘...कोमल वर्ग के साथ तो इस्लाम ने जो सलूक किए हैं उनको देखते हुए अन्य समाजों का व्यवहार पाशविक जान पड़ता है। किस समाज में स्त्रियों का जायदाद पर इतना हक़ माना गया है जितना इस्लाम में? ...हमारे विचार में वही सभ्यता श्रेष्ठ होने का दावा कर सकती है जो व्यक्ति को अधिक से अधिक उठने का अवसर दे। इस लिहाज़ से भी इस्लामी सभ्यता को कोई दूषित नहीं ठहरा सकता।’’
‘‘...हज़रत (मुहम्मद सल्ल॰) ने फ़रमाया—कोई मनुष्य उस वक़्त तक मोमिन (सच्चा मुस्लिम) नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई-बन्दों के लिए भी वही न चाहे जितना वह अपने लिए चाहता है। ...जो प्राणी दूसरों का उपकार नहीं करता ख़ुदा उससे ख़ुश नहीं होता। उनका यह कथन सोने के अक्षरों में लिखे जाने योग्य है—‘‘ईश्वर की समस्त सृष्टि उसका परिवार है वही प्राणी ईश्वर का (सच्चा) भक्त है जो ख़ुदा के बन्दों के साथ नेकी करता है।’’ ...अगर तुम्हें ख़ुदा की बन्दगी करनी है तो पहले उसके बन्दों से मुहब्बत करो।’’
‘‘...सूद (ब्याज) की पद्धति ने संसार में जितने अनर्थ किए हैं और कर रही है वह किसी से छिपे नहीं है। इस्लाम वह अकेला धर्म है जिसने सूद को हराम (अवैध) ठहराया है...।’’
—‘इस्लामी सभ्यता’
साप्ताहिक प्रताप विशेषांक दिसम्बर 1925
Wednesday, 26 October 2016
शिक्षा का संदेश पैगम्बर मुहम्मद साहब को सबसे प्यारा था
पैगम्बर हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के जीवन की कई घटनाएं ऐसी हैं जो पढ़ने-समझने में साधारण लगती हैं, लेकिन उनमें कई बड़े इशारे छुपे होते हैं। वे साधारण इसलिए लगती हैं ताकि साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी उन्हें समझने की कोशिश कर सके और उनमें बड़े व गहरे संकेत इसलिए होते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां उनसे सबक लेती रहें। आज मैं ऐसी ही एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा।
यह तब की बात है जब बद्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। यह प्यारे नबी (सल्ल.) व उनके साथियों पर थोपा गया युद्ध था। युद्ध में नबी (सल्ल.) ने बहुत कम संसाधनों से दुश्मन का सामना किया एवं विजय प्राप्त की।
युद्ध के पश्चात दुश्मन के कई सैनिक बंदी बना लिए गए। अब यह फैसला करना था कि इन बंदी सैनिकों के साथ क्या किया जाए। ये वे लोग थे जिन्होंने रब के रसूल (सल्ल.) को कष्ट दिए थे। अब मदीना को नुकसान पहुंचाने के इरादे से आए थे।
हजरत उमर (रजि.) ने उनकी हरकतों के लिए मृत्युदंड का सुझाव दिया। वहीं हजरत अबू-बक्र (रजि.) ने नर्मी बरतने का अनुरोध किया। प्यारे नबी (सल्ल.) ने उस समय यह ऐतिहासिक निर्णय लिया जो बहुत ही शिक्षाप्रद है।
- चूंकि दुश्मन ने हमला कर मदीना का नुकसान किया था, कई सैनिक शहीद कर दिए थे, इसलिए नुकसान की भरपाई तथा शहीदों के परिजनों के भरण-पोषण के लिए यह उचित ही था कि जो बंदी बहुत धनवान थे, उनसे क्षतिपूर्ति ली जाए।
- जो बंदी पढ़ना-लिखना जानते थे, लेकिन क्षतिपूर्ति देने में समर्थ नहीं थे, उन्हें यह दायित्व सौंपा गया कि वे मदीना के दस-दस बच्चों को पढ़ाएं।
- जो अनपढ़, नासमझ, गरीब थे, उन्हें यूं ही छोड़ दिया गया।
इस ऐतिहासिक फैसले का दूसरा बिंदु सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसे एक बार फिर पढ़िए। इस नियम के जरिए प्यारे नबी (सल्ल.) हमें यह संदेश देना चाहते थे-
1. ज्ञान (कोई भी विषय) का महत्व हमेशा से है और सदा-सर्वदा रहेगा।
2. ज्ञान प्राप्त करने का अवसर आए तो उसे हासिल करना चाहिए। सीखने में आलस्य नहीं करना चाहिए।
3. जो अवसर तथा सुविधा मिलने के बावजूद पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी नही लेते, वे पिछड़ जाते हैं और अपनी दुर्गति के खुद जिम्मेदार होते हैं।
4. बच्चों के भविष्य की फिक्र जरूरी है। उन्हें पढ़ाओ-लिखाओ। घर में अनाज कम है तो कम खाओ, पर बच्चों को पढ़ाओ। नबी (सल्ल.) ने एक नेता व अभिभावक के तौर पर उस जमाने में बच्चों के पढ़ने-लिखने का प्रबंध करवाया जब मदीना की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी।
5. अगर युद्ध के हालात हैं, तो भी सुनहरे भविष्य की उम्मीद न छोड़ो। शांतिकाल में ही नहीं युद्धकाल में भी यथासंभव पढ़ाई-लिखाई होनी चाहिए। इन घटनाओं के समय मदीना पर बार-बार युद्ध के बादल मंडरा रहे थे।
6. तलवार (यानी हथियार) का महत्व है लेकिन बेहतर होगा कि ये देश की रक्षा करने वाले सैनिकों के हाथों में हों। जनता के हाथों में कलम ही अच्छी लगती है।
7. बेशक तलवार में ताकत है, पर यह कलम की बराबरी नहीं कर सकती।
8. जब सीखने की बारी आए तो शिक्षक का नाम, गांव, धर्म-मजहब कोई मायने नहीं रखता। उससे सीखो और उसकी इज्जत करो।
9. नबी (सल्ल.) ने ज्ञान के बदले दुश्मन को भी जीवनदान दे दिया था। ज्ञान की कद्र की, दुश्मन को उसके गुनाह के बावजूद माफी दे दी।
10. नबी (सल्ल.) ने दुश्मन के खून का बदला खून से नहीं लिया। आपने (सल्ल.) खून से ज्यादा स्याही को महत्व दिया, इस तरह कलम को तलवार से ऊंचा स्थान दिया।
11. शिक्षा के जरिए नबी (सल्ल.) बच्चों का उज्ज्वल भविष्य चाहते थे। आप (सल्ल.) चाहते थे कि मदीना के वे बच्चे पढ़-लिखकर इस धरती को बेहतर बनाएं। आपने (सल्ल.) युद्धकाल में भी शिक्षा को जरूरी समझा। इस बात पर गौर कीजिए, जिन्होंने युद्धकाल में शिक्षा को जरूरी समझा, उनके फैसले के पीछे निश्चित रूप से सकारात्मक सोच रही होगी।
आप (सल्ल.) नकारात्मकता को पसंद करने वाले नहीं थे। इसलिए आपकी मंशा यही थी कि शिक्षा का उपयोग हमेशा सकारात्मक कार्यों के लिए हो। प्यारे नबी (सल्ल.) यह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि पढ़ाई-लिखाई का उपयोग समाज में उपद्रव फैलाने के लिए किया जाए। जिसे लड़ाई के माहौल में भी बच्चों के भविष्य की फिक्र हो, वह शांति के समय में लड़ाई नहीं चाहेगा।
मैं इस बिंदु पर इसलिए ज्यादा जोर दे रहा हूं क्योंकि अक्सर आतंकवादी गुटों के सरगनाओं के उच्च शिक्षित होने, उनके डाॅक्टर-इंजीनियर होने पर लोगों को विश्लेषण करते सुना है कि ये लोग इस्लाम का हिस्सा हैं। ये इस्लाम का हिस्सा कैसे हो सकते हैं जब नबी (सल्ल.) ने ज्ञान का दुरुपयोग करने की बात कभी नहीं कही? जो ज्ञान का दुरुपयोग करता है, वह उसके लिए खुद जिम्मेदार है।
12. जिनमें काबिलियत है, जिनके पास इल्म की दौलत है, उनकी इज्जत कीजिए। भले ही वे दूसरे धर्म या दूसरे देश से हों। जो देश ज्ञान को महत्व देगा, विज्ञान की अहमियत समझेगा, नैतिकता को नहीं छोड़ेगा, उसका भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल होगा।
13. जिनका धर्म आपके धर्म से अलग है, उनके करीब जाने से न हिचको। मानो अपना ही दीन, पर उनके दीन का मखौल न उड़ाओ, उनकी इज्जत करो। उनसे कुछ अच्छी बात सीखने को मिले तो जरूर सीखो। उनके ज्ञान का सम्मान करना सीखो।
14. अच्छा सलूक करो। उनसे भी जिनका धर्म आपके धर्म से अलग है। आपको कोई अधिकार नहीं कि उन्हें सताएं या मारे-पीटें। लोग जितना अच्छा सलूक अपनी औलाद से नहीं करते होंगे, नबी (सल्ल.) ने उससे अच्छा सलूक दुश्मन से किया था। जब खाने की कमी थी, तब मदीना में दुश्मन पेट भरकर सोए और नबी (सल्ल.) ने थोड़े से खजूर और पानी पर ही गुजारा किया।
15. नबी (सल्ल.) गुणों की परख करना जानते थे। आपने (सल्ल.) दुश्मन के गुण की कद्र की। आपके अच्छे सलूक ने दुश्मनी को दोस्ती में बदला। हम सबक लें कि दुश्मन नहीं दोस्त बनाएं, गुण की कद्र करें।
16. हम जल्दबाजी में और भावुकता से फैसला न लें। नबी (सल्ल.) चाहते तो सभी दुश्मनों की गर्दनें कलम करवा सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया। वह फैसला लिया जिसमें सबकी भलाई थी।
17. दुश्मनी में उठी तलवार सिर्फ गर्दनें काट सकती है। समझदारी से पकड़ी गई कलम खुशहाली की सच्ची कहानी लिख सकती है। अब आप और मैं फैसला कर लें कि तलवार से एक-दूसरे का खून बहाना चाहते हैं या कलम से खुशहाली लाना चाहते हैं।
18. रब ही जानता है कि नबी (सल्ल.) के जीवन से जुड़ी इस घटना में और कितने इशारे छुपे हैं। मेरी साधारण बुद्धि से मैं जितना समझ पाया हूं, वह मैंने यहां बताने की कोशिश की है। सभी को इन्हें समझना चाहिए।
- राजीव शर्मा -