Tuesday, 11 December 2018

मंगल खान मेवाती-भारत के महान स्वतन्त्रता सेनानी

नूरुद्दीन नूर

कलकत्ता के निकट जगरगच्छा जेल में बंद उन 56 कैदियों को रोटी दी नही जातीं थी बल्कि कुत्ते बिल्लियों की तरह उनके सामने फैंकी जाती थी। एक दिन फिरंगी अधिकारी निरीक्षण पर आया तो वह उनकी बैरक तक भी पहुंचा। औह…दीज आर दी ब्रेव इंडियन ?’ फिरंगी अधिकारी नें मुंह बनाते हुए पीछे खडे पिठ्ठुओं से पूछा। तो पीछे से आवाज आईयस सर। फिरंगी अफसर के दोनों हाथ बैरक के गेट में लगी लोहे की सलाखों पर थे। बैरक में बंद कैदी उसके इरादों को भांप व समझ चुके थे। हूं..इंडियन ब्रेवज ? काना कैसा मिलते हैं ? फिरंगी का यह सवाल सुन कर खून खोल गया। उसने खडे होने का प्रयास किया, परन्तु साथी बडे अफसर ने हाथ दबा दिया।

फिरंगी मानने वाला कहां था, उसने फिर कहा ‘एह..अमने पूचा, काना कैसा मिलते है ?’ उसका चेहरा लाल हो गया। खडा होने लगा तो उसी अफसर ने फिर हाथ दबाने का प्रयास किया, परन्तु इस बार उसने अपने अफसर के आदेश को भी मानने से इंकार कर दिया और खडा हो गया फिरंगी अधिकारी के सामने। फिरंगी अधिकारी का घमंड चूर चूर हो गया और उसका चेहरा, गुस्से में तमतमाने लगा। ‘बोलो..बोलो ..काना कैसा मिलते हैं ?’ फिरंगी अधिकारी ने जैसे ही यह सवाल सामने खडे उस नौजवान कैदी से किया तो उसने जोर से खखार कर फिरंगी अधिकारी के मुंह पे थूक दिया। दांत पीसते हुए कहा ‘काना ऐसे मिलते हैं।’

साथ मे कैद अधिकारी ने डांटते हुए जोर से कहा ‘मंगल खान, यह ठीक नही किया। तुम कहीं भी मेवातीपन से बाज नही आते। ‘ मंगल खान, साहब की तरफ देख मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। बैरक में सभी कैदियों की चिंता स्वभाविक थी और बाहर ‘इंडियन ब्रेव’ की हरकत से हल्ला मच गया। तरह की आवाजें आ रही थी ‘बाहर निकालो इन्हें’। ‘सबक सिखाओ इनको’ ‘इतना मारो कि भारत का नाम भी न ले पाएं’। उसके बाद जो हुआ उसे लिखने में मेरी उंगली कांप रही है। आंखें नम होने लगी हैं। बस..

यह मंगल खान कोई ओर नही , हरियाणा के मेवात जिले के खंड नूंह के गांव खेडला में जन्मा भारत मां का एक सच्चा सपूत था। श्री मंगल खान मेवाती का जन्म 1-10-1898 को गांव के एक साधारण व गरीब से किसान नवाज खां के घर मे हुआ। 1924 मे वे ब्रिटिश सेना में भर्ती हुए। बाद में बाबू सुभाष चन्द्र बोस के आह्वान पर ब्रिटिश सेना से बागी हो कर आजाद हिन्द फौज में चले गए। आजाद हिन्द फौज में, वे शाहनवाज बटालियन में सैकिंड लैफ्टिनेंट बने। जनरल शाह नवाज खान के नेतृत्व में उन्होनें रंगून, पोपाहिल, मेकटौला, नागा-साकी, इंडोग्राम, ब्रहमइंफाल जैसे असंख्य मोर्चों पर अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए।

अदम्य साहस के बलबूते पर वे बाबू सुभाष चन्द्र बोस की निजि सीक्रेट सर्विस के इंचार्ज बनाए गए। लंबी लडाई के बाद बाबू जी के आदेश पर समूची आई०एन०ए० ने आत्म समर्पण कर दिया। 36 हजार की फौज में से 56 फौजियों की शनाख्त कर छांट लिया गया, जिन्हें कलकत्ता के निकट जगरगच्छा जैल में डाल दिया गया। जगरगच्छा जेल की यातनाओं के बाद फिर छटनी की गई तो 16 जांबाजों को दिल्ली लाकर, लाल किला में कैद कर दिया गया। जिनमें मुख्य तौर पर जनरल सहगल, जनरल शाहनवाज खान, कर्नल ढिल्लों, सैकिंड लेफ्टिनेंट मंगल खान आदी शामिल थे।

इन 16 सपूतों पर फिरंगियों ने विभिन्न धाराओं मे मुकदमें दर्ज किए। जघन्य अपराधों में कथित रूप से लिप्त इन खूंखार ‘अपराधियों’ के केसों की सुनवाई के लिए लाल किला में ही ग्यारह जजों की बैंच वाली अदालत लगाई गई। लगभग तीन साल चले मुकदमों में विभिन्न सजाएं सुनाई गईं। अपीलें हुईं। आखिर में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लाल किला ट्रायल में उक्त कथित अभियुक्तों की पैरवी की और ये वतन के सिपाही, भारत मां की स्वतंत्रता के साथ आजाद हो गए।

अपनी बकिया जिंदगी उसी खुद्दारी और सादगी से जीते हुए आज ही के दिन 19 सितंबर 1990 को इस दुनिया ए फानी से कूच कर गए। परवरदिगार उनकी मगफिरत करे। जन्नत उल फिरदौस में आला से आला मकाम अता फरमाए। उनकी कब्र को नूर से हमेशा मन्नव्वर रखे।

(लेखक नूरूद्दीन नूर ऐडवोकेट महान स्वतंत्रता सेनानी स्व० चौधरी मंगल खान मेवाती के पुत्र हैं और मेवात के  खेडला गांव जिला नूंह  हरियाणा के रहने वाले हैं)

Sunday, 13 May 2018

शैतान को क्यो जंजीर से जकड़ा जाता है,जबकि अल्लाह ने शैतान को क़यामत तक खुली छूट दी है???(ग़ैर मुस्लिम का सवाल)

एक हदीस है....'''Prophet Muhammad, the Messenger of Allah, peace and blessings be upon him, once said: “When the month of Ramadan begins, the gates of the heaven are opened; the gates of Hell-fire are closed, and the devils are chained.” (Sahih Bukhari 1800)'''

शाब्दिक अर्थों को पकड़ कर अर्थ निकालनें वालों से अक्सर ग़लती होती है..हदीसों के मामले में भी यही हुआ है...बात किसी और संदर्भ में कही गई होती है और बात का मतलब कुछ और निकाल लिया जाता है...
इस हदीस के साथ भी यही है...इस हदीस का संदर्भ अलंकारिक(metaphore) भाषा में है... यहां रमज़ानों में जन्न्त के दरवाज़े खुलना व दोज़क के बंद हो जाना व शैतान का बेड़ियों में कैद हो जाना शाब्दिक(literal meaning) नहीं अपितु अलंकारिक है...
यह हदीस एक तरह से रमज़ान का संदेश है...यानि रमज़ान की महत्वता/गुण/अल्लाह के समीप इस महीने का महत्व का संदेश सही मायनें में यह हदीस देती है...

रमाज़नों में जन्नत के दरवाज़े खुल जानें का अभिप्राय यह है कि यह महीन अल्लाह की विशेष दया आशिर्वाद व क्षमा (Mercy/blessing/Forgiveness) का है और जो निस्वार्थ/लगन/आत्मियता से अल्लाह की तरफ झुकेगा/इबादत करेगा कुछ शक नहीं कि वह अल्लाह की दया/क्षमा का हक़दार बन जाये जिसका पारितोषिक जन्नत के सिवा कुछ और नहीं....
इस ही तरह दोज़क के दरवाज़े बंद हो जानें से भी यही मतलब है जितना इबादत व गुनाहों की माफी मांगी जायेगी दोज़क उतनी ही दूर होगी .....

इस ही तरह शैतान के बेड़ियों में जकड़ देनें के संदर्भ में है ..यानि यह महीन ख़ालिस अल्लाह की इबादत व उसकी दया का है इस महीने की हुर्मत की वजह से ही बंदा ख़ुद अल्लाह की इबादत में लग जाता है व गुनाहों को करनें से डरता है ...इस ही वजह से कहा गया कि शैतान बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है..बंदे को बुरे कामों की तरफ उकसा नहीं पाता...इसका यह मतलब नहीं कि कहीं शैतान को litrally कहीं बेड़ियों में कैद कर दिया जाता है...
#एडमिन (फ़ारूक़ खान)- ग़ैर मुस्लिमो के सवालों के जवाब(फेसबुक ग्रुप)

दादा मदारी का किला

***🌏*** दादा मदारी का किला ***🌏***
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   क्ळा पहाड़ (अरावली पर्वत) के पूर्वी दामन में बसे गाँव  बड़का अलीमुद्दीन के उत्तरी छौर पर एक पहाड़ी टीले पर एक लम्बा चौड़ा भवन है,जिसे स्थानीय लोग मदारी का किला कहते हैं। हालांकि अब यह विशाल गढ़ी नुमा भवन खण्डहर में तबदील होता जा रहा है। केवल पूर्वी दी दीवार व पश्चिमी गलियारा व टूटा हुआ मुख्य द्वार ही बचा है,मगर' खण्डहर बता रहे हैं कि इमारत बुलन्द थी।'
     अरावली पहाड़ के पत्थरों को तराश कर बनाई गई यह इमारत समय में एक छोटे से किले का आभास देती होगी। यह पूरा भवन एक छोटे से किले (गढ़ी) की तरह है जिसके पूर्वी कोनों पर बुर्जियाँ बनी हुई हैं। पश्चिम में मुख्य दरवाजा है जिसके बांई ओर दोहरा गलियारा है। भवन के दक्षिणी ओर भी इसी तरह का दोहरा गलियारा है जिसके ऊपर रहने के कमरे बने हुए हैं। पूर्वी दोहरे गलियारे के ऊपर बारह दरी है। उत्तर दिशा में गलियारे के खण्डहर नजर आते हैं। पश्चिमी दीवार पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। मौटे तौर पर कहा जा सकता है कि नीचे का बाहर वाला गलियारा घोड़ों के लिए और अन्दर वाला गलियारा घुड़सवारों,सिपाहियों व सुरक्षा गार्डों के लिए बनाये गये होंगे।
      पूरा भवन एक ऐसे पहाड़ी टीले पर बना है जिसके चारों ओर सीधा ढ़लान है,जिसके ऊपर चढ़ना आसान काम नहीं है। भवन के पूर्वी ओर भवन से थोड़ी दूर एक छोटी सी मीनार बनी है जो संभवतः किसी आकश्मिक संकेत के लिए या वाच टावर के तौर पर प्रयोग की जाती होगी।
     मदारी खाँ मेवाती,बड़किया देंहगल मेव था,जो भरतपुर के राजा जवाहर सिंह के नजदीकी साथियों में से था। उनका काल 1755 ई0 माना जाता है। महाराजा जवाहर सिंह जब पुष्कर स्नान करने गया था तो उस समय मदारी खाँ भी उनके साथ था। पुष्कर से लौटते समय जब भरतपुर सैना का मुकाबला जयपुर की शक्तिशाली सैना से हुआ तो भरतपुर की सैना पराजित हो भाग खड़ी हुई। ऐसे समय भरतपुर की सैना के तोपखाने के इन्चार्ज समरू फ्रांसी के साथ मदारी खाँ,दलमीर(मालाखेड़ा) और जल्ला(घांसौली) आदि मेव सरदार जयपुर की सैना से लड़ते-भिड़ते महाराजा जवाहर सिंह को सुरक्षित निकाल लाये और उन्हें सुरक्षित भरतपुर पहुँचा दिया।
     उन्हीं रणवीर मदारी खाँ की आखिरी निशानी,उनके गौरव और दबदबे की पहचान ' उनकी गढ़ी' खण्डहर में तबदील हो चुकी है,मगर हमें अपनी इस ऐतिहासिक वारासत के संरक्षण का अहसास तक नहीं।
      साथी वरिष्ठ समाज सेवी ज़नाब दीन मौहम्मद मामलीका जी और कायमदीन ठेकेदार के साथ इसकी हालत देखकर मैं यही सोच रहा था। काश! हम अब भी सचेत हो जाएं।
    कबीरा बाड़ी उजड़गी,गयो बाळदो खाय।
    अब भी याकी सार कर,जासू कुछ पल्ले पड़ जाय।।
                                 ***
                                 -- सिद्दीक़ अहमद 'मेव'

मश्क़ वाले- मेवात की बाते


दिल्ली और मेवात के शक़्क़ा

मश्क़ वाला
हमारे मेवात में इन्हें शक़्क़ा या भिस्ती कहते है,आम तौर पर घूमते रहते थ,ेचमड़े के बने  थैले जिसे मश्क़ कहते थे उसमे पानी भरते थे,और राह चलतों को पिलाते थे,मुझे याद है,बचपन मे मैंने एक बार अपने गांव में देखा था,पुरानी दिल्ली अपना अस्तित्व खो चुकीं है,मेवात दिल्ली का रिश्ता बहुत पुराना रहा है।
युद्ध के मैदान में जब घायल सैनिको की मरहमपट्टी और उन्हें पानी पिलाना बिना किसी भेदभाव के ये मश्क़ वाले अपना धर्म समझते थे।
इंसान को पानी पिलाना इनका सदियों से चलता आ रहा फर्ज रहा है।
आज वक़्त बदल गया, बदलते वक्त के साथ,बदल गई,सूरत ए दिल्ली,वरना एक दिन वो भी था,की दिल मे बस्ती थी,पुरानी दिल्ली

Tuesday, 5 December 2017

जब मुफ्त में नमक नहीं मिलता, कोई करोड़ों की पूंजी लगाकर मुफ्त का अखबार और समाचार क्यों देता है?

जनसरोकारों की बात करने वाले छोटे-छोटे मीडिया समूह आपकी मदद के बगैर नहीं चल सकते। आम लोगों की बात करने वाली मीडिया, आपकी हैं। आप उसके पाठक हैं। आप उसे पढ़ें। दूसरों को बताएं। हो सके तो आर्थिक मदद करें। 

आप दुकानदार से नमक मांगते हैं, आप उम्मीद करते हैं आपको नमक ही मिलेगा।
आप नमक खरीदने दुकान जाते हैं। दुकान में नमक नहीं हो तो आप क्या करते हैं? मैं दूसरी दुकान जाती  हूं। आप भी ऐसा ही करते होंगें।

आप जब कभी नमक लेने जाएं, और आपको नमक मिले ही नहीं। आप उस दुकान पर जाना छोड़ देंगे।
नमक नहीं मिलने पर आप दुकान जाना छोड़ सकते हैं। टीवी, अखबार और वेबसाइट पर आपको ‘खबर’ नहीं मिलती। फिर भी टीवी देखना, अखबार खरीदना और वेबसाइट पर जाना क्यों नहीं छोड़ते?
टीवी देखने और वेबसाइट पर खबर पढ़ने के लिए अलग से पैसै नहीं देने होते इसलिए, 2-4 रुपये में 20 पन्ने का अखबार मिल जाता है। या आपको इसकी आदत लग गयी है।
बावजूद, आप न्यूज मीडिया को सोशल साइट्स पर गालियां देते हैं। सभा-सेमिनारों में आप न्यूज मीडिया को कोसते हैं।
“मीडिया सच नहीं बताता।“
“मीडिया गांव नहीं जाता।“
“मीडिया राजनेताओं का गुलाम है।“
“ये बिकी हुई मीडिया आपको सच नहीं दिखाएगा।“
“संघी मीडिया”
“कम्युनिस्ट मीडिया”
“गोदी मीडिया”
… आपके पास लंबी लिस्ट है, मीडिया को कठघरे में रखने के लिए।
न्यूज मीडिया क्यों सच नहीं बता पाता, वह क्यों राजनेताओं की गुलाम हो गया। क्यों वह संघी और कम्युनिस्ट हो गया। मीडिया की साख क्यों गिर रही है। वह चंद लोगों की खबरे ही क्यों दिखाता है। इसमें सिर्फ मीडिया का ही दोष नहीं है।
देश में 1,05,4431 समाचार पत्र और पत्रिकाएं रजिस्टर्ड हैं। संभव है, ज्यादातर अखबार, पत्रिकाएं सिर्फ ‘कागज’ पर ही हों। फिर भी आपके पास विकल्पों की कमी तो नहीं!
पूरी दुनिया के उलट आपको करीब-करीब मुफ्त में अखबार मिलता है। आपको वेबसाइट पर खबर पढ़ने के लिए पैसा नहीं देना पड़ता। फिर भी भारत उन चंद देशों में एक है जहां बाकी न्यूज मीडिया के साथ प्रिंट मीडिया भी फायदे में है।
एक नेशनल न्यूज पोर्टल चलाने का खर्चा करोड़ रुपया आता है। अखबार या टीवी चैनल चलाना किसी बड़े औद्योगिक घराने के लिए ही संभव है। इतनी बड़ी पूंजी लगने के बाद भी आपको ‘मुफ्त’ में खबर कैसै मिल पाती है? कई बार अखबार लेने पर मोबाइल, बरतन, घड़ी भी मिलते हैं। ये अलग फायदे हैं।
जब मुफ्त में नमक नहीं मिलता, कोई करोड़ों की पूंजी लगाकर मुफ्त का अखबार और समाचार क्यों देता है?
न्यूज मीडिया उद्योग में करोड़ो रूपये लगे हुए हैं। राजनेता, कॉरपोरेट, माफिया और डॉन अपने एजेंडे को पूरे करने के लिए इन न्यूज मीडिया हाउस के शेयर होल्डर बनते हैं। खरीद भी लेते हैं। संपादक और पत्रकार अपने मालिक के एजेंडे को पूरा करते हैं। पूरा करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। विरोध करने पर निकाले भी जाते हैं। आखिर कोई भी बेरोजगार होना नहीं चाहता!
न्यूज मीडिया जब टीवी और अखबार से चलकर वेबसाइट पर पहुंचा तो विज्ञापन का हिसाब बदल गया। वेबपोर्टल चलाना कम पूंजी और खर्च में संभव हुआ। पाठक को राजा बनने का मौका मिला। लगा कि कॉरपोरेट-राजनेता-माफिया का न्यूज मीडिया से कब्जा खत्म हुआ। लोकहित की बात आप पढेंगे। जो पढ़ेगे वही लिखा भी जाएगा। लेकिन हुआ उल्टा, नयी वाली न्यूज मीडिया लाइक, शेयर और विजिट बनाने के चक्कर में और पतित हो गई।
ऑनलाइन मीडिया को आसानी से पता चल जाता है कि ‘लोग’ क्या पढ़ना चाहते है। उनकी ‘पसंद’ क्या है। किस न्यूज स्टोरी, फीचर और आर्टिकल को कितने लोगों ने देखा और पढ़ा है। यह सब लाइव पता चलते रहता है। न्यूज मीडिया उसी तरह के कंटेट आपके बीच लाते हैं, जिसे आप सबसे ज्यादा देखते और खोजते हैं।
आप किसी न्यूज मीडिया पर जाना छोड़ देगें तो वे अपने छुपे एजेंडे को भी पूरा नहीं कर पाएंगे। आप अपनी ताकत पहचानिये।
लोग क्या पढ़ना सुनना और देखना चाहते हैं? यह जानने के लिए कभी यू-ट्यूब ट्रेंड देखिये पता चल जाएगा।
अखबार मालिक की अपनी मजबूरियां और एजेंडे हो सकते हैं। वहां राजनेताओं, कॉरपोरेट और खनन माफिया के करोड़ो रुपये लगे हैं। सम्पादक अपने मालिक के दवाब में हो सकता है। लेकिन आपके पास क्या मजबूरी है? आप हर शाम वही टीवी चैनल क्यों देखते हैं। अखबार क्यों नहीं बदलते? इसलिए, क्योंकि इनकी आदत पड़ चुकी है?
आप समाचार नहीं चाहते। आप अपनी पसंदीदा पार्टी की आलोचना सुनने का धैर्य खो चुके हैं। इसलिए आपको वही एंकर और चैनल अच्छा लगने लगा है जो सिर्फ आपके मन की बात करता हो। किसी पार्टी की गतिविधि को पढ़ने के लिए उसका मुखपत्र होता है। न्यूज मीडिया, मुखपत्र का विकल्प नहीं हो सकता। आप किसी समाचार या लेख के पसंदीदा हिस्से को शेयर करते हैं। पूरा समाचार या लेख आपको पसंद नहीं। तो खबरें भी एक एकतरफा बनने लगीं। ताकि उसे आप शेयर करें। इससे विजिट बढ़ेंगे। विजिट होगा तो विज्ञापन मिलेगा।
ग्रामीण भारत की खबरें एक फीसदी भी मुख्य पृष्ठ पर जगह नहीं पाती। क्योंकि ऐसी खबरों को पढ़ने वाले बहुत कम हैं। इंटरनेट पर आम लोगों के सरोकार की खबरों की कमी नहीं, उसे पढ़ने वालों की कमी है। आप जैसा पढ़ना चाहेंगे, वैसा लिखा जाएगा। कम-से-कम दबाव तो जरूर बनेगा।
आम लोगों के सरोकारों से जुड़े दर्जनों पोर्टल और पत्रिकाएं पैसे के अभाव में बंद हो जाते हैं। वे किसी राजनेता या कारपोरेट की वकालत नहीं करते हैं। सरकार की आलोचना करने वाले अखबारों का विज्ञापन बंद कर दिया जाता है। जनसरोकारों की बात करने वाले छोटे-छोटे मीडिया समूह आपकी मदद के बगैर नहीं चल सकते। आम लोगों की बात करने वाली मीडिया, आपकी हैं। आप उसके पाठक हैं। आप उसे पढ़ें। दूसरों को बताएं। हो सके तो आर्थिक मदद करें।
जब आप नमक मुफ्त में नहीं खरीदते, तो विचार और समाचार मुफ्त में क्यों चाहते हैं? वैसे मुफ्त कुछ मिलता है क्या?

निकिताशा कौर बरार 

Friday, 10 November 2017

सँघर्ष की जीवित कहानी

वो अपने आप मे एक अलग तरह का इंसान है,मुखर प्रवक्ता,लोकतंत्रिक प्रक्रिया में विश्वास करने वाला,
वो मुझसे ओर साथियो से खूब खरी खोटी कहता,अपनी बात प्रभावी ढंग से रखता,अपनी राय अकेला भी कहता ओर उस पर जमे रहता लेकिन आखिर में सबकी राय में सहमत भी हो जाता ये उसकी हर बैठक का दस्तूर था,हम समझते थे वो सबका मुखालिफ है जबकि सही मायने में वो संगठन और हम सबका मुहाफ़िज़ साबित होता,
बड़प्पन तो उसका इस बात से पता चलता है कि वो उम्र और तजुर्बों में मुझसे बहुत बड़ा आदमी है फिर भी लगभग 6 साल मेरे जैसे अदना आदमी के साथ वो मेवात विकास सभा का महासचिव बना रहा,
आज में उसी बड़ी सख्सियत के बारे में लिखने की कोशिश करूंगा ओर उनका नाम है दीन मोहम्मद मामलीका, जिनकी पैदायश सन 1956 में निहायत पिछड़े गांव मामलीक़ा पुन्हाना में हुई,ताऊ के लड़के याकूब के सानिध्य से प्राइमरी ओर सेकेंडरी शिक्षा पिनगवां खंड के सरकारी स्कूलों  से प्राप्त की ओर बाद में यासीन मेव डिग्री कॉलेज में बी कॉम के चलते 18/19 साल की उम्र में नगीना में खुर्शीद आलम के आगमन पर एक जोरदार भाषण दे डाला ओर आई बी ने केस रजिस्ट्र कर दिया जहां से शुरू हुई सामाजिक संघर्ष की जिंदगी,डिग्री पास के बाद  MITC में जॉब की ओर आखिरी वक्त बिजली विभाग से सेवानिवृत्त भी हुए,इसी बीच बीवा गांव के मशहूर घराने में शादी हुई जिससे तीन लड़की और दो लड़के आज मौजूद है,
बचपन से ही कुछ अलग करने की ख्वाहिश ने गांव में ही संघर्ष करने के लिये जागरूक कर दिया और उमर मोहम्मद गांव के लड़के के साथ मिलकर सारे गांव को मतदान ना करने के लिए राजी कर लिया और बिजली,पानी और सड़क जैसे मुद्दों के लिए मेवात में पहला मौका था जब किसी पूरे गांव ने मतदान में हिस्सा ना लिया हो,नतीजा चुनाव से एक रात पहले गांव में बिजली लगी और दो मांगे कुछ दिन बाद पूरी हुई,1972 में कॉमरेड इस्लामुद्दीन रूपडाका के साथ ने जिंदगी के असली आयाम दिए और जिसके चलते कर्मचारी यूनियन के रेवाड़ी ज़िले के सचिव बने और अपने कर्मचारी वर्ग के लिए खूब संघर्स किया ओर इसी अरसा मायसो से जुड़ गए जहाँ डॉ सुभान खान,महमूद खान नाइ नंगला, कॉमरेड अय्यूब नगीना, कॉमरेड जगदीश मंडकोला के साथ काम करने का मौका मिला,जिससे जिंदगी को जीवट से लड़ने का अनुभव हुआ,जिसके चलते मेवात के पिछड़ेपन को दूर करने की कई लड़ाई लड़ने ओर जीतने का सौभाग्य मिला,
1991 में साक्षरता अभियान से जुड़े, मैसो का गठन किया जिससे मेवात जिले के लिए आन्दोलन चलाया बाद में मेवात विकास सभा में शामिल हुए ओर 3 बार महासचिव ओर एक बार अध्यक्ष पद पर रहकर नवोदय विद्यालय,मेवात केनाल व रेलवे लाइन,रेनीवेल परियोजना,मेवात यूनिवर्सटी की मांग उठाई ओर  मेडिकल कॉलेज, किसानों के लिए संघर्ष किया,
आज भी उनका सपना है कि मेवात दूसरे क्षेत्रों के साथ विकास की गति प्राप्त करे जो सही दिशा में किये गए संघर्ष से ही संभव है,
दीन मोहम्मद मामलिका के संघर्ष को कुछ शब्दों में लिख पाना संभव ही नही है फिर भी उनकी जिंदगी के कुछ पहलुओं पर रोशनी डालने की कोशिश की है,
आपकी राय का तालिब,

रमज़ान चौधरी,
अध्यक्ष,
आल इंडिया मेवाती समाज,

Tuesday, 7 November 2017

मेवातियों के हौंसले -गदर 1857

शूरवीर मेवातियो,
आज 8 नवम्बर है।---कुछ याद है ?-- शायद नहीं!--खैर;
    आज के दिन यानि 8 नवम्बर, 1857 को,मेवात के ऐति साहसिक गाँव घासेड़ा में,अली हसन खाँ मेवाती की कमान में,मेवाती क्रान्तिकारियों ने लै0 रॉन्टगन की अंग्रेजी सैना का जोरदार मुकाबला किया था।
    दिल्ली से लगभग 72 किमी दक्षिण में,दिल्ली-अलवर सड़क पर स्थित है मेवात का ऐतिहासिक गाँव घासेड़ा।
    दिल्ली पर दोबारा अधिकार हो जाने के पश्चात,अंग्रेजी सैना बदले की भावना से भारतीयों का क्रूरता के साथ दमन करने पर उतारू थी। इधर मेवाती क्रान्तिकारी अब भी अंग्रेजी सैना का जोरदार ढ़ंग से मुकाबला कर रहे थे। मगर इस समय अंग्रेजों के पिट्ठू भारतीय जासूस भी सक्रिय हो चुके थे,जो पल-पल की खबर अपने आकाओं को दिल्ली भेज रहे थे। ऐसे ही लोगों ने अंग्रेजों को खबर भिजवाई कि हजारों मेवाती क्रान्तिकारी बायोटा,रेवासन और घासेड़ा में जमा हो रहे हैं और इनके इरादे बड़े खतरनाक हैं।
     सूचना मिलते ही अंग्रेजी सैनिक तन्त्र सक्रिय हो गया और लैफ्टिनेन्ट के नेतृत्व में एक मजबूत सैनिक दस्ता,गाँव बायोटा,रेवासन और घासेड़ा को तबाह व बर्बाद करने के लिए भेजा।
   इस दस्ते में कुमाऊं रैजीमेन्ट का एक नेटिव अक्सर,दो नाॅन कमीशन्ड अफ्सर,63 पैदल सैनिक और 50 टोहाना घुड़सवारों का नेतृत्व लै0 रॉन्टगन खुद कर रहा था।
    यह दस्ता बायोटा,रेवासन व रास्ते में पड़ने वाले दूसरे गाँवों को तबाह व बर्बाद करता हुआ 8 नवम्बर, 1857 को घासेड़ा पहुंचा। लै0 रॉन्टगन ने गाँव मैलावास की पहाड़ी के पास पड़ाव डाला और एक जासूस गाँव की स्थिति की जानकारी के लिए भेजा,जिसने खबर भिजवाई कि लगभग 400-500 मेवाती ,हथियारों से लैस गाँव के सामने खड़े हैं। अंग्रेजी सैना के आने का शायद उन्हें पता नहीं है।
    लै0 रॉन्टगन ने अपने सैनिक दस्ते को दो भागों में बांटा और घासेड़ा पर हमला करने के लिए कूच किया। पहले मैलावास की ओर से आने वाली सैना से मेवातियों का मुकाबला हुआ,जिसे क्रान्तिकारियों ने बुरी तरह पराजित कर मार भगाया। मगर इसी समय लै0 रॉन्टगन ने रेवासन की तरफ से हमला कर गाँव में आग लगा दी और जोरदार गोलाबारी शुरू कर दी। इस हमले से क्रान्तिकारी हतप्रभ तो हुए मगर उन्होंने एक जुट हो अंग्रेजी सैना पर जोरदार हमला किया। भीषण युद्ध शुरू हो गया। राॅन्गटन ने तोपों का मुंह खोल दिया और जौरदार गोलाबारी शुरू कर दी। मगर क्रान्तिकारी के पीछे नहीं हटे। भीषण मार्किट शुरू हो गई। देखते ही देखते 150 लाशें बिछ गई। मैदान लहू से लाल हो गया। मगर तोपों की बरतरी और आधुनिक राईफलों के कारण मैदान अंग्रेजी सैना के हाथ रहा। मगर भारी जानी व माली नुक्सान के बाद।
                            -- सिद्दीक़ अहमद 'मेव'इतिहासकार