Tuesday, 7 November 2017

मेवातियों के हौंसले -गदर 1857

शूरवीर मेवातियो,
आज 8 नवम्बर है।---कुछ याद है ?-- शायद नहीं!--खैर;
    आज के दिन यानि 8 नवम्बर, 1857 को,मेवात के ऐति साहसिक गाँव घासेड़ा में,अली हसन खाँ मेवाती की कमान में,मेवाती क्रान्तिकारियों ने लै0 रॉन्टगन की अंग्रेजी सैना का जोरदार मुकाबला किया था।
    दिल्ली से लगभग 72 किमी दक्षिण में,दिल्ली-अलवर सड़क पर स्थित है मेवात का ऐतिहासिक गाँव घासेड़ा।
    दिल्ली पर दोबारा अधिकार हो जाने के पश्चात,अंग्रेजी सैना बदले की भावना से भारतीयों का क्रूरता के साथ दमन करने पर उतारू थी। इधर मेवाती क्रान्तिकारी अब भी अंग्रेजी सैना का जोरदार ढ़ंग से मुकाबला कर रहे थे। मगर इस समय अंग्रेजों के पिट्ठू भारतीय जासूस भी सक्रिय हो चुके थे,जो पल-पल की खबर अपने आकाओं को दिल्ली भेज रहे थे। ऐसे ही लोगों ने अंग्रेजों को खबर भिजवाई कि हजारों मेवाती क्रान्तिकारी बायोटा,रेवासन और घासेड़ा में जमा हो रहे हैं और इनके इरादे बड़े खतरनाक हैं।
     सूचना मिलते ही अंग्रेजी सैनिक तन्त्र सक्रिय हो गया और लैफ्टिनेन्ट के नेतृत्व में एक मजबूत सैनिक दस्ता,गाँव बायोटा,रेवासन और घासेड़ा को तबाह व बर्बाद करने के लिए भेजा।
   इस दस्ते में कुमाऊं रैजीमेन्ट का एक नेटिव अक्सर,दो नाॅन कमीशन्ड अफ्सर,63 पैदल सैनिक और 50 टोहाना घुड़सवारों का नेतृत्व लै0 रॉन्टगन खुद कर रहा था।
    यह दस्ता बायोटा,रेवासन व रास्ते में पड़ने वाले दूसरे गाँवों को तबाह व बर्बाद करता हुआ 8 नवम्बर, 1857 को घासेड़ा पहुंचा। लै0 रॉन्टगन ने गाँव मैलावास की पहाड़ी के पास पड़ाव डाला और एक जासूस गाँव की स्थिति की जानकारी के लिए भेजा,जिसने खबर भिजवाई कि लगभग 400-500 मेवाती ,हथियारों से लैस गाँव के सामने खड़े हैं। अंग्रेजी सैना के आने का शायद उन्हें पता नहीं है।
    लै0 रॉन्टगन ने अपने सैनिक दस्ते को दो भागों में बांटा और घासेड़ा पर हमला करने के लिए कूच किया। पहले मैलावास की ओर से आने वाली सैना से मेवातियों का मुकाबला हुआ,जिसे क्रान्तिकारियों ने बुरी तरह पराजित कर मार भगाया। मगर इसी समय लै0 रॉन्टगन ने रेवासन की तरफ से हमला कर गाँव में आग लगा दी और जोरदार गोलाबारी शुरू कर दी। इस हमले से क्रान्तिकारी हतप्रभ तो हुए मगर उन्होंने एक जुट हो अंग्रेजी सैना पर जोरदार हमला किया। भीषण युद्ध शुरू हो गया। राॅन्गटन ने तोपों का मुंह खोल दिया और जौरदार गोलाबारी शुरू कर दी। मगर क्रान्तिकारी के पीछे नहीं हटे। भीषण मार्किट शुरू हो गई। देखते ही देखते 150 लाशें बिछ गई। मैदान लहू से लाल हो गया। मगर तोपों की बरतरी और आधुनिक राईफलों के कारण मैदान अंग्रेजी सैना के हाथ रहा। मगर भारी जानी व माली नुक्सान के बाद।
                            -- सिद्दीक़ अहमद 'मेव'इतिहासकार

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