Sunday, 13 May 2018

दादा मदारी का किला

***🌏*** दादा मदारी का किला ***🌏***
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   क्ळा पहाड़ (अरावली पर्वत) के पूर्वी दामन में बसे गाँव  बड़का अलीमुद्दीन के उत्तरी छौर पर एक पहाड़ी टीले पर एक लम्बा चौड़ा भवन है,जिसे स्थानीय लोग मदारी का किला कहते हैं। हालांकि अब यह विशाल गढ़ी नुमा भवन खण्डहर में तबदील होता जा रहा है। केवल पूर्वी दी दीवार व पश्चिमी गलियारा व टूटा हुआ मुख्य द्वार ही बचा है,मगर' खण्डहर बता रहे हैं कि इमारत बुलन्द थी।'
     अरावली पहाड़ के पत्थरों को तराश कर बनाई गई यह इमारत समय में एक छोटे से किले का आभास देती होगी। यह पूरा भवन एक छोटे से किले (गढ़ी) की तरह है जिसके पूर्वी कोनों पर बुर्जियाँ बनी हुई हैं। पश्चिम में मुख्य दरवाजा है जिसके बांई ओर दोहरा गलियारा है। भवन के दक्षिणी ओर भी इसी तरह का दोहरा गलियारा है जिसके ऊपर रहने के कमरे बने हुए हैं। पूर्वी दोहरे गलियारे के ऊपर बारह दरी है। उत्तर दिशा में गलियारे के खण्डहर नजर आते हैं। पश्चिमी दीवार पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। मौटे तौर पर कहा जा सकता है कि नीचे का बाहर वाला गलियारा घोड़ों के लिए और अन्दर वाला गलियारा घुड़सवारों,सिपाहियों व सुरक्षा गार्डों के लिए बनाये गये होंगे।
      पूरा भवन एक ऐसे पहाड़ी टीले पर बना है जिसके चारों ओर सीधा ढ़लान है,जिसके ऊपर चढ़ना आसान काम नहीं है। भवन के पूर्वी ओर भवन से थोड़ी दूर एक छोटी सी मीनार बनी है जो संभवतः किसी आकश्मिक संकेत के लिए या वाच टावर के तौर पर प्रयोग की जाती होगी।
     मदारी खाँ मेवाती,बड़किया देंहगल मेव था,जो भरतपुर के राजा जवाहर सिंह के नजदीकी साथियों में से था। उनका काल 1755 ई0 माना जाता है। महाराजा जवाहर सिंह जब पुष्कर स्नान करने गया था तो उस समय मदारी खाँ भी उनके साथ था। पुष्कर से लौटते समय जब भरतपुर सैना का मुकाबला जयपुर की शक्तिशाली सैना से हुआ तो भरतपुर की सैना पराजित हो भाग खड़ी हुई। ऐसे समय भरतपुर की सैना के तोपखाने के इन्चार्ज समरू फ्रांसी के साथ मदारी खाँ,दलमीर(मालाखेड़ा) और जल्ला(घांसौली) आदि मेव सरदार जयपुर की सैना से लड़ते-भिड़ते महाराजा जवाहर सिंह को सुरक्षित निकाल लाये और उन्हें सुरक्षित भरतपुर पहुँचा दिया।
     उन्हीं रणवीर मदारी खाँ की आखिरी निशानी,उनके गौरव और दबदबे की पहचान ' उनकी गढ़ी' खण्डहर में तबदील हो चुकी है,मगर हमें अपनी इस ऐतिहासिक वारासत के संरक्षण का अहसास तक नहीं।
      साथी वरिष्ठ समाज सेवी ज़नाब दीन मौहम्मद मामलीका जी और कायमदीन ठेकेदार के साथ इसकी हालत देखकर मैं यही सोच रहा था। काश! हम अब भी सचेत हो जाएं।
    कबीरा बाड़ी उजड़गी,गयो बाळदो खाय।
    अब भी याकी सार कर,जासू कुछ पल्ले पड़ जाय।।
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                                 -- सिद्दीक़ अहमद 'मेव'

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