Sunday, 13 May 2018

शैतान को क्यो जंजीर से जकड़ा जाता है,जबकि अल्लाह ने शैतान को क़यामत तक खुली छूट दी है???(ग़ैर मुस्लिम का सवाल)

एक हदीस है....'''Prophet Muhammad, the Messenger of Allah, peace and blessings be upon him, once said: “When the month of Ramadan begins, the gates of the heaven are opened; the gates of Hell-fire are closed, and the devils are chained.” (Sahih Bukhari 1800)'''

शाब्दिक अर्थों को पकड़ कर अर्थ निकालनें वालों से अक्सर ग़लती होती है..हदीसों के मामले में भी यही हुआ है...बात किसी और संदर्भ में कही गई होती है और बात का मतलब कुछ और निकाल लिया जाता है...
इस हदीस के साथ भी यही है...इस हदीस का संदर्भ अलंकारिक(metaphore) भाषा में है... यहां रमज़ानों में जन्न्त के दरवाज़े खुलना व दोज़क के बंद हो जाना व शैतान का बेड़ियों में कैद हो जाना शाब्दिक(literal meaning) नहीं अपितु अलंकारिक है...
यह हदीस एक तरह से रमज़ान का संदेश है...यानि रमज़ान की महत्वता/गुण/अल्लाह के समीप इस महीने का महत्व का संदेश सही मायनें में यह हदीस देती है...

रमाज़नों में जन्नत के दरवाज़े खुल जानें का अभिप्राय यह है कि यह महीन अल्लाह की विशेष दया आशिर्वाद व क्षमा (Mercy/blessing/Forgiveness) का है और जो निस्वार्थ/लगन/आत्मियता से अल्लाह की तरफ झुकेगा/इबादत करेगा कुछ शक नहीं कि वह अल्लाह की दया/क्षमा का हक़दार बन जाये जिसका पारितोषिक जन्नत के सिवा कुछ और नहीं....
इस ही तरह दोज़क के दरवाज़े बंद हो जानें से भी यही मतलब है जितना इबादत व गुनाहों की माफी मांगी जायेगी दोज़क उतनी ही दूर होगी .....

इस ही तरह शैतान के बेड़ियों में जकड़ देनें के संदर्भ में है ..यानि यह महीन ख़ालिस अल्लाह की इबादत व उसकी दया का है इस महीने की हुर्मत की वजह से ही बंदा ख़ुद अल्लाह की इबादत में लग जाता है व गुनाहों को करनें से डरता है ...इस ही वजह से कहा गया कि शैतान बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है..बंदे को बुरे कामों की तरफ उकसा नहीं पाता...इसका यह मतलब नहीं कि कहीं शैतान को litrally कहीं बेड़ियों में कैद कर दिया जाता है...
#एडमिन (फ़ारूक़ खान)- ग़ैर मुस्लिमो के सवालों के जवाब(फेसबुक ग्रुप)

दादा मदारी का किला

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   क्ळा पहाड़ (अरावली पर्वत) के पूर्वी दामन में बसे गाँव  बड़का अलीमुद्दीन के उत्तरी छौर पर एक पहाड़ी टीले पर एक लम्बा चौड़ा भवन है,जिसे स्थानीय लोग मदारी का किला कहते हैं। हालांकि अब यह विशाल गढ़ी नुमा भवन खण्डहर में तबदील होता जा रहा है। केवल पूर्वी दी दीवार व पश्चिमी गलियारा व टूटा हुआ मुख्य द्वार ही बचा है,मगर' खण्डहर बता रहे हैं कि इमारत बुलन्द थी।'
     अरावली पहाड़ के पत्थरों को तराश कर बनाई गई यह इमारत समय में एक छोटे से किले का आभास देती होगी। यह पूरा भवन एक छोटे से किले (गढ़ी) की तरह है जिसके पूर्वी कोनों पर बुर्जियाँ बनी हुई हैं। पश्चिम में मुख्य दरवाजा है जिसके बांई ओर दोहरा गलियारा है। भवन के दक्षिणी ओर भी इसी तरह का दोहरा गलियारा है जिसके ऊपर रहने के कमरे बने हुए हैं। पूर्वी दोहरे गलियारे के ऊपर बारह दरी है। उत्तर दिशा में गलियारे के खण्डहर नजर आते हैं। पश्चिमी दीवार पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। मौटे तौर पर कहा जा सकता है कि नीचे का बाहर वाला गलियारा घोड़ों के लिए और अन्दर वाला गलियारा घुड़सवारों,सिपाहियों व सुरक्षा गार्डों के लिए बनाये गये होंगे।
      पूरा भवन एक ऐसे पहाड़ी टीले पर बना है जिसके चारों ओर सीधा ढ़लान है,जिसके ऊपर चढ़ना आसान काम नहीं है। भवन के पूर्वी ओर भवन से थोड़ी दूर एक छोटी सी मीनार बनी है जो संभवतः किसी आकश्मिक संकेत के लिए या वाच टावर के तौर पर प्रयोग की जाती होगी।
     मदारी खाँ मेवाती,बड़किया देंहगल मेव था,जो भरतपुर के राजा जवाहर सिंह के नजदीकी साथियों में से था। उनका काल 1755 ई0 माना जाता है। महाराजा जवाहर सिंह जब पुष्कर स्नान करने गया था तो उस समय मदारी खाँ भी उनके साथ था। पुष्कर से लौटते समय जब भरतपुर सैना का मुकाबला जयपुर की शक्तिशाली सैना से हुआ तो भरतपुर की सैना पराजित हो भाग खड़ी हुई। ऐसे समय भरतपुर की सैना के तोपखाने के इन्चार्ज समरू फ्रांसी के साथ मदारी खाँ,दलमीर(मालाखेड़ा) और जल्ला(घांसौली) आदि मेव सरदार जयपुर की सैना से लड़ते-भिड़ते महाराजा जवाहर सिंह को सुरक्षित निकाल लाये और उन्हें सुरक्षित भरतपुर पहुँचा दिया।
     उन्हीं रणवीर मदारी खाँ की आखिरी निशानी,उनके गौरव और दबदबे की पहचान ' उनकी गढ़ी' खण्डहर में तबदील हो चुकी है,मगर हमें अपनी इस ऐतिहासिक वारासत के संरक्षण का अहसास तक नहीं।
      साथी वरिष्ठ समाज सेवी ज़नाब दीन मौहम्मद मामलीका जी और कायमदीन ठेकेदार के साथ इसकी हालत देखकर मैं यही सोच रहा था। काश! हम अब भी सचेत हो जाएं।
    कबीरा बाड़ी उजड़गी,गयो बाळदो खाय।
    अब भी याकी सार कर,जासू कुछ पल्ले पड़ जाय।।
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                                 -- सिद्दीक़ अहमद 'मेव'

मश्क़ वाले- मेवात की बाते


दिल्ली और मेवात के शक़्क़ा

मश्क़ वाला
हमारे मेवात में इन्हें शक़्क़ा या भिस्ती कहते है,आम तौर पर घूमते रहते थ,ेचमड़े के बने  थैले जिसे मश्क़ कहते थे उसमे पानी भरते थे,और राह चलतों को पिलाते थे,मुझे याद है,बचपन मे मैंने एक बार अपने गांव में देखा था,पुरानी दिल्ली अपना अस्तित्व खो चुकीं है,मेवात दिल्ली का रिश्ता बहुत पुराना रहा है।
युद्ध के मैदान में जब घायल सैनिको की मरहमपट्टी और उन्हें पानी पिलाना बिना किसी भेदभाव के ये मश्क़ वाले अपना धर्म समझते थे।
इंसान को पानी पिलाना इनका सदियों से चलता आ रहा फर्ज रहा है।
आज वक़्त बदल गया, बदलते वक्त के साथ,बदल गई,सूरत ए दिल्ली,वरना एक दिन वो भी था,की दिल मे बस्ती थी,पुरानी दिल्ली