एक हदीस है....'''Prophet Muhammad, the Messenger of Allah, peace and blessings be upon him, once said: “When the month of Ramadan begins, the gates of the heaven are opened; the gates of Hell-fire are closed, and the devils are chained.” (Sahih Bukhari 1800)'''
शाब्दिक अर्थों को पकड़ कर अर्थ निकालनें वालों से अक्सर ग़लती होती है..हदीसों के मामले में भी यही हुआ है...बात किसी और संदर्भ में कही गई होती है और बात का मतलब कुछ और निकाल लिया जाता है...
इस हदीस के साथ भी यही है...इस हदीस का संदर्भ अलंकारिक(metaphore) भाषा में है... यहां रमज़ानों में जन्न्त के दरवाज़े खुलना व दोज़क के बंद हो जाना व शैतान का बेड़ियों में कैद हो जाना शाब्दिक(literal meaning) नहीं अपितु अलंकारिक है...
यह हदीस एक तरह से रमज़ान का संदेश है...यानि रमज़ान की महत्वता/गुण/अल्लाह के समीप इस महीने का महत्व का संदेश सही मायनें में यह हदीस देती है...
रमाज़नों में जन्नत के दरवाज़े खुल जानें का अभिप्राय यह है कि यह महीन अल्लाह की विशेष दया आशिर्वाद व क्षमा (Mercy/blessing/Forgiveness) का है और जो निस्वार्थ/लगन/आत्मियता से अल्लाह की तरफ झुकेगा/इबादत करेगा कुछ शक नहीं कि वह अल्लाह की दया/क्षमा का हक़दार बन जाये जिसका पारितोषिक जन्नत के सिवा कुछ और नहीं....
इस ही तरह दोज़क के दरवाज़े बंद हो जानें से भी यही मतलब है जितना इबादत व गुनाहों की माफी मांगी जायेगी दोज़क उतनी ही दूर होगी .....
इस ही तरह शैतान के बेड़ियों में जकड़ देनें के संदर्भ में है ..यानि यह महीन ख़ालिस अल्लाह की इबादत व उसकी दया का है इस महीने की हुर्मत की वजह से ही बंदा ख़ुद अल्लाह की इबादत में लग जाता है व गुनाहों को करनें से डरता है ...इस ही वजह से कहा गया कि शैतान बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है..बंदे को बुरे कामों की तरफ उकसा नहीं पाता...इसका यह मतलब नहीं कि कहीं शैतान को litrally कहीं बेड़ियों में कैद कर दिया जाता है...
#एडमिन (फ़ारूक़ खान)- ग़ैर मुस्लिमो के सवालों के जवाब(फेसबुक ग्रुप)