Friday, 10 November 2017

सँघर्ष की जीवित कहानी

वो अपने आप मे एक अलग तरह का इंसान है,मुखर प्रवक्ता,लोकतंत्रिक प्रक्रिया में विश्वास करने वाला,
वो मुझसे ओर साथियो से खूब खरी खोटी कहता,अपनी बात प्रभावी ढंग से रखता,अपनी राय अकेला भी कहता ओर उस पर जमे रहता लेकिन आखिर में सबकी राय में सहमत भी हो जाता ये उसकी हर बैठक का दस्तूर था,हम समझते थे वो सबका मुखालिफ है जबकि सही मायने में वो संगठन और हम सबका मुहाफ़िज़ साबित होता,
बड़प्पन तो उसका इस बात से पता चलता है कि वो उम्र और तजुर्बों में मुझसे बहुत बड़ा आदमी है फिर भी लगभग 6 साल मेरे जैसे अदना आदमी के साथ वो मेवात विकास सभा का महासचिव बना रहा,
आज में उसी बड़ी सख्सियत के बारे में लिखने की कोशिश करूंगा ओर उनका नाम है दीन मोहम्मद मामलीका, जिनकी पैदायश सन 1956 में निहायत पिछड़े गांव मामलीक़ा पुन्हाना में हुई,ताऊ के लड़के याकूब के सानिध्य से प्राइमरी ओर सेकेंडरी शिक्षा पिनगवां खंड के सरकारी स्कूलों  से प्राप्त की ओर बाद में यासीन मेव डिग्री कॉलेज में बी कॉम के चलते 18/19 साल की उम्र में नगीना में खुर्शीद आलम के आगमन पर एक जोरदार भाषण दे डाला ओर आई बी ने केस रजिस्ट्र कर दिया जहां से शुरू हुई सामाजिक संघर्ष की जिंदगी,डिग्री पास के बाद  MITC में जॉब की ओर आखिरी वक्त बिजली विभाग से सेवानिवृत्त भी हुए,इसी बीच बीवा गांव के मशहूर घराने में शादी हुई जिससे तीन लड़की और दो लड़के आज मौजूद है,
बचपन से ही कुछ अलग करने की ख्वाहिश ने गांव में ही संघर्ष करने के लिये जागरूक कर दिया और उमर मोहम्मद गांव के लड़के के साथ मिलकर सारे गांव को मतदान ना करने के लिए राजी कर लिया और बिजली,पानी और सड़क जैसे मुद्दों के लिए मेवात में पहला मौका था जब किसी पूरे गांव ने मतदान में हिस्सा ना लिया हो,नतीजा चुनाव से एक रात पहले गांव में बिजली लगी और दो मांगे कुछ दिन बाद पूरी हुई,1972 में कॉमरेड इस्लामुद्दीन रूपडाका के साथ ने जिंदगी के असली आयाम दिए और जिसके चलते कर्मचारी यूनियन के रेवाड़ी ज़िले के सचिव बने और अपने कर्मचारी वर्ग के लिए खूब संघर्स किया ओर इसी अरसा मायसो से जुड़ गए जहाँ डॉ सुभान खान,महमूद खान नाइ नंगला, कॉमरेड अय्यूब नगीना, कॉमरेड जगदीश मंडकोला के साथ काम करने का मौका मिला,जिससे जिंदगी को जीवट से लड़ने का अनुभव हुआ,जिसके चलते मेवात के पिछड़ेपन को दूर करने की कई लड़ाई लड़ने ओर जीतने का सौभाग्य मिला,
1991 में साक्षरता अभियान से जुड़े, मैसो का गठन किया जिससे मेवात जिले के लिए आन्दोलन चलाया बाद में मेवात विकास सभा में शामिल हुए ओर 3 बार महासचिव ओर एक बार अध्यक्ष पद पर रहकर नवोदय विद्यालय,मेवात केनाल व रेलवे लाइन,रेनीवेल परियोजना,मेवात यूनिवर्सटी की मांग उठाई ओर  मेडिकल कॉलेज, किसानों के लिए संघर्ष किया,
आज भी उनका सपना है कि मेवात दूसरे क्षेत्रों के साथ विकास की गति प्राप्त करे जो सही दिशा में किये गए संघर्ष से ही संभव है,
दीन मोहम्मद मामलिका के संघर्ष को कुछ शब्दों में लिख पाना संभव ही नही है फिर भी उनकी जिंदगी के कुछ पहलुओं पर रोशनी डालने की कोशिश की है,
आपकी राय का तालिब,

रमज़ान चौधरी,
अध्यक्ष,
आल इंडिया मेवाती समाज,

Tuesday, 7 November 2017

मेवातियों के हौंसले -गदर 1857

शूरवीर मेवातियो,
आज 8 नवम्बर है।---कुछ याद है ?-- शायद नहीं!--खैर;
    आज के दिन यानि 8 नवम्बर, 1857 को,मेवात के ऐति साहसिक गाँव घासेड़ा में,अली हसन खाँ मेवाती की कमान में,मेवाती क्रान्तिकारियों ने लै0 रॉन्टगन की अंग्रेजी सैना का जोरदार मुकाबला किया था।
    दिल्ली से लगभग 72 किमी दक्षिण में,दिल्ली-अलवर सड़क पर स्थित है मेवात का ऐतिहासिक गाँव घासेड़ा।
    दिल्ली पर दोबारा अधिकार हो जाने के पश्चात,अंग्रेजी सैना बदले की भावना से भारतीयों का क्रूरता के साथ दमन करने पर उतारू थी। इधर मेवाती क्रान्तिकारी अब भी अंग्रेजी सैना का जोरदार ढ़ंग से मुकाबला कर रहे थे। मगर इस समय अंग्रेजों के पिट्ठू भारतीय जासूस भी सक्रिय हो चुके थे,जो पल-पल की खबर अपने आकाओं को दिल्ली भेज रहे थे। ऐसे ही लोगों ने अंग्रेजों को खबर भिजवाई कि हजारों मेवाती क्रान्तिकारी बायोटा,रेवासन और घासेड़ा में जमा हो रहे हैं और इनके इरादे बड़े खतरनाक हैं।
     सूचना मिलते ही अंग्रेजी सैनिक तन्त्र सक्रिय हो गया और लैफ्टिनेन्ट के नेतृत्व में एक मजबूत सैनिक दस्ता,गाँव बायोटा,रेवासन और घासेड़ा को तबाह व बर्बाद करने के लिए भेजा।
   इस दस्ते में कुमाऊं रैजीमेन्ट का एक नेटिव अक्सर,दो नाॅन कमीशन्ड अफ्सर,63 पैदल सैनिक और 50 टोहाना घुड़सवारों का नेतृत्व लै0 रॉन्टगन खुद कर रहा था।
    यह दस्ता बायोटा,रेवासन व रास्ते में पड़ने वाले दूसरे गाँवों को तबाह व बर्बाद करता हुआ 8 नवम्बर, 1857 को घासेड़ा पहुंचा। लै0 रॉन्टगन ने गाँव मैलावास की पहाड़ी के पास पड़ाव डाला और एक जासूस गाँव की स्थिति की जानकारी के लिए भेजा,जिसने खबर भिजवाई कि लगभग 400-500 मेवाती ,हथियारों से लैस गाँव के सामने खड़े हैं। अंग्रेजी सैना के आने का शायद उन्हें पता नहीं है।
    लै0 रॉन्टगन ने अपने सैनिक दस्ते को दो भागों में बांटा और घासेड़ा पर हमला करने के लिए कूच किया। पहले मैलावास की ओर से आने वाली सैना से मेवातियों का मुकाबला हुआ,जिसे क्रान्तिकारियों ने बुरी तरह पराजित कर मार भगाया। मगर इसी समय लै0 रॉन्टगन ने रेवासन की तरफ से हमला कर गाँव में आग लगा दी और जोरदार गोलाबारी शुरू कर दी। इस हमले से क्रान्तिकारी हतप्रभ तो हुए मगर उन्होंने एक जुट हो अंग्रेजी सैना पर जोरदार हमला किया। भीषण युद्ध शुरू हो गया। राॅन्गटन ने तोपों का मुंह खोल दिया और जौरदार गोलाबारी शुरू कर दी। मगर क्रान्तिकारी के पीछे नहीं हटे। भीषण मार्किट शुरू हो गई। देखते ही देखते 150 लाशें बिछ गई। मैदान लहू से लाल हो गया। मगर तोपों की बरतरी और आधुनिक राईफलों के कारण मैदान अंग्रेजी सैना के हाथ रहा। मगर भारी जानी व माली नुक्सान के बाद।
                            -- सिद्दीक़ अहमद 'मेव'इतिहासकार