Tuesday, 5 December 2017

जब मुफ्त में नमक नहीं मिलता, कोई करोड़ों की पूंजी लगाकर मुफ्त का अखबार और समाचार क्यों देता है?

जनसरोकारों की बात करने वाले छोटे-छोटे मीडिया समूह आपकी मदद के बगैर नहीं चल सकते। आम लोगों की बात करने वाली मीडिया, आपकी हैं। आप उसके पाठक हैं। आप उसे पढ़ें। दूसरों को बताएं। हो सके तो आर्थिक मदद करें। 

आप दुकानदार से नमक मांगते हैं, आप उम्मीद करते हैं आपको नमक ही मिलेगा।
आप नमक खरीदने दुकान जाते हैं। दुकान में नमक नहीं हो तो आप क्या करते हैं? मैं दूसरी दुकान जाती  हूं। आप भी ऐसा ही करते होंगें।

आप जब कभी नमक लेने जाएं, और आपको नमक मिले ही नहीं। आप उस दुकान पर जाना छोड़ देंगे।
नमक नहीं मिलने पर आप दुकान जाना छोड़ सकते हैं। टीवी, अखबार और वेबसाइट पर आपको ‘खबर’ नहीं मिलती। फिर भी टीवी देखना, अखबार खरीदना और वेबसाइट पर जाना क्यों नहीं छोड़ते?
टीवी देखने और वेबसाइट पर खबर पढ़ने के लिए अलग से पैसै नहीं देने होते इसलिए, 2-4 रुपये में 20 पन्ने का अखबार मिल जाता है। या आपको इसकी आदत लग गयी है।
बावजूद, आप न्यूज मीडिया को सोशल साइट्स पर गालियां देते हैं। सभा-सेमिनारों में आप न्यूज मीडिया को कोसते हैं।
“मीडिया सच नहीं बताता।“
“मीडिया गांव नहीं जाता।“
“मीडिया राजनेताओं का गुलाम है।“
“ये बिकी हुई मीडिया आपको सच नहीं दिखाएगा।“
“संघी मीडिया”
“कम्युनिस्ट मीडिया”
“गोदी मीडिया”
… आपके पास लंबी लिस्ट है, मीडिया को कठघरे में रखने के लिए।
न्यूज मीडिया क्यों सच नहीं बता पाता, वह क्यों राजनेताओं की गुलाम हो गया। क्यों वह संघी और कम्युनिस्ट हो गया। मीडिया की साख क्यों गिर रही है। वह चंद लोगों की खबरे ही क्यों दिखाता है। इसमें सिर्फ मीडिया का ही दोष नहीं है।
देश में 1,05,4431 समाचार पत्र और पत्रिकाएं रजिस्टर्ड हैं। संभव है, ज्यादातर अखबार, पत्रिकाएं सिर्फ ‘कागज’ पर ही हों। फिर भी आपके पास विकल्पों की कमी तो नहीं!
पूरी दुनिया के उलट आपको करीब-करीब मुफ्त में अखबार मिलता है। आपको वेबसाइट पर खबर पढ़ने के लिए पैसा नहीं देना पड़ता। फिर भी भारत उन चंद देशों में एक है जहां बाकी न्यूज मीडिया के साथ प्रिंट मीडिया भी फायदे में है।
एक नेशनल न्यूज पोर्टल चलाने का खर्चा करोड़ रुपया आता है। अखबार या टीवी चैनल चलाना किसी बड़े औद्योगिक घराने के लिए ही संभव है। इतनी बड़ी पूंजी लगने के बाद भी आपको ‘मुफ्त’ में खबर कैसै मिल पाती है? कई बार अखबार लेने पर मोबाइल, बरतन, घड़ी भी मिलते हैं। ये अलग फायदे हैं।
जब मुफ्त में नमक नहीं मिलता, कोई करोड़ों की पूंजी लगाकर मुफ्त का अखबार और समाचार क्यों देता है?
न्यूज मीडिया उद्योग में करोड़ो रूपये लगे हुए हैं। राजनेता, कॉरपोरेट, माफिया और डॉन अपने एजेंडे को पूरे करने के लिए इन न्यूज मीडिया हाउस के शेयर होल्डर बनते हैं। खरीद भी लेते हैं। संपादक और पत्रकार अपने मालिक के एजेंडे को पूरा करते हैं। पूरा करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। विरोध करने पर निकाले भी जाते हैं। आखिर कोई भी बेरोजगार होना नहीं चाहता!
न्यूज मीडिया जब टीवी और अखबार से चलकर वेबसाइट पर पहुंचा तो विज्ञापन का हिसाब बदल गया। वेबपोर्टल चलाना कम पूंजी और खर्च में संभव हुआ। पाठक को राजा बनने का मौका मिला। लगा कि कॉरपोरेट-राजनेता-माफिया का न्यूज मीडिया से कब्जा खत्म हुआ। लोकहित की बात आप पढेंगे। जो पढ़ेगे वही लिखा भी जाएगा। लेकिन हुआ उल्टा, नयी वाली न्यूज मीडिया लाइक, शेयर और विजिट बनाने के चक्कर में और पतित हो गई।
ऑनलाइन मीडिया को आसानी से पता चल जाता है कि ‘लोग’ क्या पढ़ना चाहते है। उनकी ‘पसंद’ क्या है। किस न्यूज स्टोरी, फीचर और आर्टिकल को कितने लोगों ने देखा और पढ़ा है। यह सब लाइव पता चलते रहता है। न्यूज मीडिया उसी तरह के कंटेट आपके बीच लाते हैं, जिसे आप सबसे ज्यादा देखते और खोजते हैं।
आप किसी न्यूज मीडिया पर जाना छोड़ देगें तो वे अपने छुपे एजेंडे को भी पूरा नहीं कर पाएंगे। आप अपनी ताकत पहचानिये।
लोग क्या पढ़ना सुनना और देखना चाहते हैं? यह जानने के लिए कभी यू-ट्यूब ट्रेंड देखिये पता चल जाएगा।
अखबार मालिक की अपनी मजबूरियां और एजेंडे हो सकते हैं। वहां राजनेताओं, कॉरपोरेट और खनन माफिया के करोड़ो रुपये लगे हैं। सम्पादक अपने मालिक के दवाब में हो सकता है। लेकिन आपके पास क्या मजबूरी है? आप हर शाम वही टीवी चैनल क्यों देखते हैं। अखबार क्यों नहीं बदलते? इसलिए, क्योंकि इनकी आदत पड़ चुकी है?
आप समाचार नहीं चाहते। आप अपनी पसंदीदा पार्टी की आलोचना सुनने का धैर्य खो चुके हैं। इसलिए आपको वही एंकर और चैनल अच्छा लगने लगा है जो सिर्फ आपके मन की बात करता हो। किसी पार्टी की गतिविधि को पढ़ने के लिए उसका मुखपत्र होता है। न्यूज मीडिया, मुखपत्र का विकल्प नहीं हो सकता। आप किसी समाचार या लेख के पसंदीदा हिस्से को शेयर करते हैं। पूरा समाचार या लेख आपको पसंद नहीं। तो खबरें भी एक एकतरफा बनने लगीं। ताकि उसे आप शेयर करें। इससे विजिट बढ़ेंगे। विजिट होगा तो विज्ञापन मिलेगा।
ग्रामीण भारत की खबरें एक फीसदी भी मुख्य पृष्ठ पर जगह नहीं पाती। क्योंकि ऐसी खबरों को पढ़ने वाले बहुत कम हैं। इंटरनेट पर आम लोगों के सरोकार की खबरों की कमी नहीं, उसे पढ़ने वालों की कमी है। आप जैसा पढ़ना चाहेंगे, वैसा लिखा जाएगा। कम-से-कम दबाव तो जरूर बनेगा।
आम लोगों के सरोकारों से जुड़े दर्जनों पोर्टल और पत्रिकाएं पैसे के अभाव में बंद हो जाते हैं। वे किसी राजनेता या कारपोरेट की वकालत नहीं करते हैं। सरकार की आलोचना करने वाले अखबारों का विज्ञापन बंद कर दिया जाता है। जनसरोकारों की बात करने वाले छोटे-छोटे मीडिया समूह आपकी मदद के बगैर नहीं चल सकते। आम लोगों की बात करने वाली मीडिया, आपकी हैं। आप उसके पाठक हैं। आप उसे पढ़ें। दूसरों को बताएं। हो सके तो आर्थिक मदद करें।
जब आप नमक मुफ्त में नहीं खरीदते, तो विचार और समाचार मुफ्त में क्यों चाहते हैं? वैसे मुफ्त कुछ मिलता है क्या?

निकिताशा कौर बरार 

Friday, 10 November 2017

सँघर्ष की जीवित कहानी

वो अपने आप मे एक अलग तरह का इंसान है,मुखर प्रवक्ता,लोकतंत्रिक प्रक्रिया में विश्वास करने वाला,
वो मुझसे ओर साथियो से खूब खरी खोटी कहता,अपनी बात प्रभावी ढंग से रखता,अपनी राय अकेला भी कहता ओर उस पर जमे रहता लेकिन आखिर में सबकी राय में सहमत भी हो जाता ये उसकी हर बैठक का दस्तूर था,हम समझते थे वो सबका मुखालिफ है जबकि सही मायने में वो संगठन और हम सबका मुहाफ़िज़ साबित होता,
बड़प्पन तो उसका इस बात से पता चलता है कि वो उम्र और तजुर्बों में मुझसे बहुत बड़ा आदमी है फिर भी लगभग 6 साल मेरे जैसे अदना आदमी के साथ वो मेवात विकास सभा का महासचिव बना रहा,
आज में उसी बड़ी सख्सियत के बारे में लिखने की कोशिश करूंगा ओर उनका नाम है दीन मोहम्मद मामलीका, जिनकी पैदायश सन 1956 में निहायत पिछड़े गांव मामलीक़ा पुन्हाना में हुई,ताऊ के लड़के याकूब के सानिध्य से प्राइमरी ओर सेकेंडरी शिक्षा पिनगवां खंड के सरकारी स्कूलों  से प्राप्त की ओर बाद में यासीन मेव डिग्री कॉलेज में बी कॉम के चलते 18/19 साल की उम्र में नगीना में खुर्शीद आलम के आगमन पर एक जोरदार भाषण दे डाला ओर आई बी ने केस रजिस्ट्र कर दिया जहां से शुरू हुई सामाजिक संघर्ष की जिंदगी,डिग्री पास के बाद  MITC में जॉब की ओर आखिरी वक्त बिजली विभाग से सेवानिवृत्त भी हुए,इसी बीच बीवा गांव के मशहूर घराने में शादी हुई जिससे तीन लड़की और दो लड़के आज मौजूद है,
बचपन से ही कुछ अलग करने की ख्वाहिश ने गांव में ही संघर्ष करने के लिये जागरूक कर दिया और उमर मोहम्मद गांव के लड़के के साथ मिलकर सारे गांव को मतदान ना करने के लिए राजी कर लिया और बिजली,पानी और सड़क जैसे मुद्दों के लिए मेवात में पहला मौका था जब किसी पूरे गांव ने मतदान में हिस्सा ना लिया हो,नतीजा चुनाव से एक रात पहले गांव में बिजली लगी और दो मांगे कुछ दिन बाद पूरी हुई,1972 में कॉमरेड इस्लामुद्दीन रूपडाका के साथ ने जिंदगी के असली आयाम दिए और जिसके चलते कर्मचारी यूनियन के रेवाड़ी ज़िले के सचिव बने और अपने कर्मचारी वर्ग के लिए खूब संघर्स किया ओर इसी अरसा मायसो से जुड़ गए जहाँ डॉ सुभान खान,महमूद खान नाइ नंगला, कॉमरेड अय्यूब नगीना, कॉमरेड जगदीश मंडकोला के साथ काम करने का मौका मिला,जिससे जिंदगी को जीवट से लड़ने का अनुभव हुआ,जिसके चलते मेवात के पिछड़ेपन को दूर करने की कई लड़ाई लड़ने ओर जीतने का सौभाग्य मिला,
1991 में साक्षरता अभियान से जुड़े, मैसो का गठन किया जिससे मेवात जिले के लिए आन्दोलन चलाया बाद में मेवात विकास सभा में शामिल हुए ओर 3 बार महासचिव ओर एक बार अध्यक्ष पद पर रहकर नवोदय विद्यालय,मेवात केनाल व रेलवे लाइन,रेनीवेल परियोजना,मेवात यूनिवर्सटी की मांग उठाई ओर  मेडिकल कॉलेज, किसानों के लिए संघर्ष किया,
आज भी उनका सपना है कि मेवात दूसरे क्षेत्रों के साथ विकास की गति प्राप्त करे जो सही दिशा में किये गए संघर्ष से ही संभव है,
दीन मोहम्मद मामलिका के संघर्ष को कुछ शब्दों में लिख पाना संभव ही नही है फिर भी उनकी जिंदगी के कुछ पहलुओं पर रोशनी डालने की कोशिश की है,
आपकी राय का तालिब,

रमज़ान चौधरी,
अध्यक्ष,
आल इंडिया मेवाती समाज,

Tuesday, 7 November 2017

मेवातियों के हौंसले -गदर 1857

शूरवीर मेवातियो,
आज 8 नवम्बर है।---कुछ याद है ?-- शायद नहीं!--खैर;
    आज के दिन यानि 8 नवम्बर, 1857 को,मेवात के ऐति साहसिक गाँव घासेड़ा में,अली हसन खाँ मेवाती की कमान में,मेवाती क्रान्तिकारियों ने लै0 रॉन्टगन की अंग्रेजी सैना का जोरदार मुकाबला किया था।
    दिल्ली से लगभग 72 किमी दक्षिण में,दिल्ली-अलवर सड़क पर स्थित है मेवात का ऐतिहासिक गाँव घासेड़ा।
    दिल्ली पर दोबारा अधिकार हो जाने के पश्चात,अंग्रेजी सैना बदले की भावना से भारतीयों का क्रूरता के साथ दमन करने पर उतारू थी। इधर मेवाती क्रान्तिकारी अब भी अंग्रेजी सैना का जोरदार ढ़ंग से मुकाबला कर रहे थे। मगर इस समय अंग्रेजों के पिट्ठू भारतीय जासूस भी सक्रिय हो चुके थे,जो पल-पल की खबर अपने आकाओं को दिल्ली भेज रहे थे। ऐसे ही लोगों ने अंग्रेजों को खबर भिजवाई कि हजारों मेवाती क्रान्तिकारी बायोटा,रेवासन और घासेड़ा में जमा हो रहे हैं और इनके इरादे बड़े खतरनाक हैं।
     सूचना मिलते ही अंग्रेजी सैनिक तन्त्र सक्रिय हो गया और लैफ्टिनेन्ट के नेतृत्व में एक मजबूत सैनिक दस्ता,गाँव बायोटा,रेवासन और घासेड़ा को तबाह व बर्बाद करने के लिए भेजा।
   इस दस्ते में कुमाऊं रैजीमेन्ट का एक नेटिव अक्सर,दो नाॅन कमीशन्ड अफ्सर,63 पैदल सैनिक और 50 टोहाना घुड़सवारों का नेतृत्व लै0 रॉन्टगन खुद कर रहा था।
    यह दस्ता बायोटा,रेवासन व रास्ते में पड़ने वाले दूसरे गाँवों को तबाह व बर्बाद करता हुआ 8 नवम्बर, 1857 को घासेड़ा पहुंचा। लै0 रॉन्टगन ने गाँव मैलावास की पहाड़ी के पास पड़ाव डाला और एक जासूस गाँव की स्थिति की जानकारी के लिए भेजा,जिसने खबर भिजवाई कि लगभग 400-500 मेवाती ,हथियारों से लैस गाँव के सामने खड़े हैं। अंग्रेजी सैना के आने का शायद उन्हें पता नहीं है।
    लै0 रॉन्टगन ने अपने सैनिक दस्ते को दो भागों में बांटा और घासेड़ा पर हमला करने के लिए कूच किया। पहले मैलावास की ओर से आने वाली सैना से मेवातियों का मुकाबला हुआ,जिसे क्रान्तिकारियों ने बुरी तरह पराजित कर मार भगाया। मगर इसी समय लै0 रॉन्टगन ने रेवासन की तरफ से हमला कर गाँव में आग लगा दी और जोरदार गोलाबारी शुरू कर दी। इस हमले से क्रान्तिकारी हतप्रभ तो हुए मगर उन्होंने एक जुट हो अंग्रेजी सैना पर जोरदार हमला किया। भीषण युद्ध शुरू हो गया। राॅन्गटन ने तोपों का मुंह खोल दिया और जौरदार गोलाबारी शुरू कर दी। मगर क्रान्तिकारी के पीछे नहीं हटे। भीषण मार्किट शुरू हो गई। देखते ही देखते 150 लाशें बिछ गई। मैदान लहू से लाल हो गया। मगर तोपों की बरतरी और आधुनिक राईफलों के कारण मैदान अंग्रेजी सैना के हाथ रहा। मगर भारी जानी व माली नुक्सान के बाद।
                            -- सिद्दीक़ अहमद 'मेव'इतिहासकार

Wednesday, 7 June 2017

अमर शहीद शेर अली खान

(काला पानी --21)
                शेर अली ---------1
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"       "जब वक़्त गुलिस्तां पे पड़ा!
                  तो खून हमने दिया---
          अब बहार आयी तो !
          कहते हो की तेरा काम नही!!
सेल्युलर का मतलब हे,
अलग अलग सेल -यानी अलग अलग काल कोठरी,
वैसे तो इस काला पानी की जेल मे अनेको अनेक देश भक्त सजा के लिए नही !
बल्कि यातना,पीड़ा,क्रूर अत्याचार  बर्बरता के लिए लाये गये,
इनमे बहुत से नाम हे, लेकिन मुख्य तौर पर इनमे हम,
डॉक्टर दीवान सिंह,मौलाना फजले-हक़ खैराबादी,योगेंद्र शुक्ला,बतकेश्वर दूत्त,मौलवी अहमद उल्लहा,मौलवी अब्दुल रहीम सादिकपुरी, नन्द गोपाल,सोहन सिंह,वामन राव,सदन चंद्र चटर्जी ,महावीर सिंह ,भाई परमानंद ,सावरकर आदि थे,
लेकिन यहाँ ज़िक्र होगा एक अमर शहीद का जिसके हौसले ने वो मिसाल कायम की जो आज तक कोई भी देश भक्त और आजादी का दीवाना नही कर सका,
अफ़सोस उसके उस कारनामे की गूंज विश्व पटल पर गूंजी !
लेकिन हमने उसे कभी भूल से भी याद नही किया!!
वो नाम हे ----पठान शेर अली--
145 बरस पहले अंग्रेज हकीमो के सबसे बड़े अफसर की हत्या करने वाला का नाम हे शेर अली----------
आज जितना होगा ।
शेर अली पर ही लिखुंगा।
ये फ़िज़ा जिसको हम आज़ादी कहते हे, इसमें कितने लोगो का खून शामिल हे,
हमको कोई अंदाजा नही,हम तो अब
ओह।
  "वक़्त ने अब तो !
         तस्सवुर भी तेरा छीन लिया!
                   कैसे उजड़ा था चमन !         ये भी मुझे याद नही------
ये एक ऐसे मर्दे -मुजाहिद की हिकायत हे, जिसको ना सुनाया गया,ना बताया गया,कियुंकी भारत के स्वतन्त्रा संग्राम की सबसे बड़ी घटना जो हमारे सभी सहीदो पर भारी थी !ये काम इस नुमाया दिलदार पठान ने अंजाम दिया---

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जी हां ये सच हे!
इस महान क्रांतिकारी और भारत माता के अमर सपूत का नाम ना तो किसी कोर्स की किताब मे हे, और ना ही इसका कही कोई ज़िक्र किया गया,और ना ही कोई इसकी जयंती मनाता हे, यहाँ तक की भारत के महान देश भक्तों की सूची मे भी इसका नाम नही हे,वजह किया हे, मै नही जानता,लेकिन सत्य तो विजयी ही होता हे, उसे किसी प्रमाणिकता की आवश्यक्ता नही,लेकिन ये जो भी हुआ उस से एक पोल और एक खोल या खला नजर तो आती हे, किया हमारा खून !खून नही था?
तुम कियु भूल गए,कई जगह अंग्रेज अधिकारी और उस हुकूमत के काले गोरे जल्लादों का बड़ी बड़ी किताबो मे नाम दर्ज किये,लेकिन एक शेर जो शेर ही था ,जब भारत के सभी आजादी के शेर कटघरों मे बन्द जुल्म को ललकारते थे,तब ये शेर उनको मजबूत्त बनाता था,और सबसे कहता था,शेर अली मुल्क पर मर मिटेगा,ये गोरे हमारी जान ही तो लेंगे लेकिन इनको मार मार कर भगा कर ही दम लूंगा,और कभी मरते दम तक कदम पीछे नही हटेंगे |कभी ना कदम रुकेंगे,और ना ही कभी सर झुकेगा--------

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जी हां ये भी सच हे की इस महान क्रांतिकारी ने वो किया जो कोई नही कर सका!
शेर अली आफरीदी के कार्य को समझने से पहले ये जरूर जानना होगा की जिस अंग्रेज अधिकारी को शेर अली ने चाक़ू मार मार कर मोत के घाट उतारा!
उसकी हेसियत एसी थी जैसे आज हमारे देश के  प्रधान मंत्री की!
अंग्रेजी राज के गवर्नर जनरल लार्ड मेयो की हत्या करना,
उसके सुरक्षा कवच को अकेले भेद क्र तोड़ना
और उसे मौत की नींद सुला देना,

तमाम हमलों से खुद को उस वक्त बचाना,
ये कोई आसान काम ना था,
एक बड़े जिगर और बडी हिम्मत का काम था,
उसका कौशल कार्य करने की ततपरता, शैली ,सब अनूठा था,जो कहा वो ही किया!!
साथ ही उस समय देश मे किसी की सिक्युरिटी थी तो वो गवर्नर जनरल लार्ड मियो की थी,
उसकी हत्या बिर्टिश सरकार के लिए सबसे बड़ा  जटखा और बड़ा नुकसान थी,
8 फरवरी सन 1872 के दिन गवर्नर जनरल के तमाम सुरक्षा कवच को धता बता कर उसे ध्वस्त कर
शेर अली आफरीदी ने
जनरल मियो की गर्दन को चाक़ू मार कर   जमीन पर गिरा दिया
और तब तक हाथ नही रोके और ना पीछे नही किये !
तब तक लार्ड मियो के प्राण नही निकले----
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ये भी सत्य हे!
की आजादी से पहले देश मे तमाम बड़े बड़े क्रांतिकारियों ने जिस भी हमले की योजना बनाई,उस पर हमला भी किया,लेकिन कामयाब नही हो पाये, वो काम इस अकेले सख्श शेर अली ने कर दिखाया,वो भी बिना किसी क्रांतिकारी संघठन की मदद के!
शेर अली आफरीदी !लार्ड रिचर्ड बुक(लार्ड मियो) की हत्या करना कितना बड़ा काम था आप इसी बात से जान सकते हो!
की शहीद भगत सिंह ने जिस सांडर्स की हत्या की ,वो डीएसपी स्तर का अफसर था!
पुणे मे चापेकर बन्धुओ ने कमिश्नर स्तर के अफसर की हत्या की!
रास -बिहारी बोस और विश्वास ने लार्ड हार्डिंग के हाथी पर दिल्ली मे घुसते वक़्त बम्ब फेंका था,जिस से महावत की मौत हुई लेकिन हार्डिंग बच गया,
लार्ड इरविन की स्पेसल ट्रेन पर भगवती चरण बोहरा और साथियो ने बम्ब फेंका और वो भी बच गया,एसे कितने क्रन्तिकारी हुए जिन्होंने जान की बाजी लगा कर अंग्रेज अधिकारी यो पर हमले किये, कइयों को मौत के घाट उतारा भी,लेकिन कोई भी क्रान्ति कारी उतना कामयाब नही हुआ जितना शेर अली आफरीदी,फिर शेर अली आफरीदी को आप !या देश की जनता कियूं नही जानती?
और उसे कियु इतना सम्मान नही देती?
ये आज के परिपेक्ष मे बड़े नही बहुत बड़े सवाल !जिनको खोजना तो पड़ेगा?
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आखिर कियु शेर अली आफरीदी का नाम तारीख़ से मिटाया गया?
मेरे लिए व्यक्ति गत बड़ी हैरत की बात हे, और उनके लिए जिसने ये अन्याय किया उनके लिए गैरत की !
शेर अली खान की फांसी को जिस अंग्रेज पत्रकार ने कवर किया उसने बिर्टिश के अखबारों मे शेर अली की बहादुरी को अपनी कलम से लिखा,लेकिन यहाँ के लोग और को गाते रहे शेर अली के कारनामे को कागज पर जगह नही दी,उस दौर मे अंग्रेज सरकार के दिल मे दहसत -ख़ौफ़ का नाम शेर अली था!
शेर अली आफरीदी को समझने के लिए हम को आपको सबको इस शेर के विषय मे जानना इस वक़्त बहुत ज्यादा जरूरी हे, इस लिए आप सब इसे पढ़ कर अपनी राय ज़रूर रखे।शेर अली खान को समझने के लिए ये भी ज़रूरी हे की अंग्रेजी राज मे तमाम ऐसे बड़े नाम थे,जो देश भक्त होने के बावजूद अंग्रेजी राज को क्रांतिकारियों की तरह जड़ से उखाड़ने के समर्थक नही थे!
खुद काँग्रेश पार्टी अपनी स्थापना के 45 साल बाद  सन 1930 मे पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता की बात की,
खुद महात्मा गांधी जी ने पहली बार सन 1942 मे जाकर "अंग्रेज भारत छोड़ो "का नारा दिया!
ग़ांधी जी का तो क्रान्तिकारियो से झगड़ा  ही इस बात को लेकर था कि अंग्रेज जड़ से खत्म किये जाय/
साथ ही क्रांतिकारी ये चाहते थे की कियु ना 1914 के प्रथम विश्व युद्ध,और 1939 के दूसरे विश्व युद्ध को मौका मॉन कर अंग्रेज हुकूमत पर अंदर से बड़े हमले किये जायें,
लेकिन ग़ांधी जी अंग्रेजो को मजबूरी का लाभ उठाने के सख्त खिलाफ थे,बल्कि पहले विश्व युद्ध मे तो ग़ांधी जी ने खुद अंग्रेजी सेना मे भारतीयों को भर्ती होने के लिए आह्वाहन भी किया,जो बड़ा हैरत करने वाला काम था!
ये कैसे मुमकिन था कि हमारे शूर वीर इस गलत धारणा को मानते,और एक बड़ी खाई इन लोगो के बीच मे पड़ गयी जिसके मेरे नजर मे अंग्रेज नही बल्कि ये खुद ही जिमेवार थे,
ओर अगर ये इस तरह टुकड़ो मे विभाजित नही होते तो ना ये भेद भाव होता और ना ही ये नफरत जो आज नजर आती हे नही पनपती कही ना कही इनके ये अहंकार इस आग के ईंधन की तरह काम करते रहे,ग़ांधी को भर्ती सार्जेंट कहा गया,जो उचित था,दीवाने कहा मानते थे,साथ ही और बड़ा कमाल ये की
गुरुदेव टैगोर,चितरंजन दास, मोती लाल नेहरू,दादा भाई नोरोजी,जैसे तमाम काँग्रेश के लोग और बड़े नेताओ के पास अंग्ररेजी उपाधी थी,और ये भी सत्य हे की काँग्रेश की स्थापना एक अंग्रेज ए ओ ह्यूम ने की थी,और काँग्रेश के पहले ही अधिवेशन मे अंग्रेज वायसराय डफरिन ने पूरी काँग्रेश की दावत की थी,
फिर शेर अली पठान को इतिहास मे कैसे जगह मिलती------
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ऐसे मे शेर अली का राजा राम मोहन राय या वन्देमातरम लिखने वाले बंकिम चंद्र चटर्जी की तरह अंग्रेजी सरकार मे नोकरी करना कोई बड़ी बात नही थी,
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मे अहम भूमिका निभाने वाले नाना साहब के दीवान अजीमुल्लहा खान और आज़ाद हिंद फौज को खड़े करने वाले कमांडर मोहन सिंह भी अंग्रेजो के खिलाफ जाने से पहले ईमानदारी से अंग्रेजी सरकार की नोकरी कर रहे थे,
शेर अली भी पेशावर मे अंग्ररेजी कमिश्नर के ऑफिस मे काम करता था,और खैबर पख्तून का पठान था,वो अम्बाला मे बिर्टिश रेजिमेंट मे भी काम कर चुका था,यहाँ तक की 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मे रोहिलनगळं वार और ओढ़ के युद्ध मै बिर्टिश की ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरफ से भाग ले चुका था!!
अंग्ररेजी कमांडर रेनेल टेलर उसकी बहादुरी से इतना खुश हुआ था कि उसको तोहफे मे एक घोडा एक पिस्टल और उसकी बहादुरी का भखान करने के लिए सर्टिफिकेट भी दिया था।
जिस तरह अजीमुल्लहा खान कानपुर मे अंग्रजो और यूरोपियन्स के बीच लोक-पिर्य था,उसी तरह पेशावर के अंग्रेज और यूरोपियन्स के बीच शेर अली भी उनको बहुत पिर्य था,यहाँ तक इस बहादुर शेर अली को टेलर ने अपने बच्चो की सुरक्षा मे शेर अली को लगाया,तब तक शेर अली को अंग्रेज राज बुरता नही लगा था,देश प्रेम और देश भक्ति किया हे शायद शेर अली को उस वक़्त पता ही नही था,वो तो सिर्फ स्वामिभक्त और बहादुरी से ही लबरेज था!
लेकिन जिस तरह महात्मा गांधी को साउथ अफ्रीका मे ट्रेन से लात मार कर उतारा जाना और उनको नस्ल भेद पर गुस्सा आना,जिस तरह करतार सिंह को सेनफ्रांसिस्को को मे अपमानित किया जाना,और उनका स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ना और महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद लाला लाजपत राय पर लाठी बरसाने से कई क्रान्तिकारियो का खून खोल उठना,ठीक उसी तरह शेर अली खान के साथ भी हुआ!
एक खानदानी झग़डे मे शेर अली पर अपने ही रिस्तेदार हैदर के कत्ल का इल्जाम लगा,उसने पेशावर मे मौजूद अपने सभी अधकारियों के सामने खुद को बेगुनाह बताया,लेकिन किसी ने भी उसकी बात नही मानी, और उसे 2 अप्रैल 1867 को मौत की सजा सुना दी गयी।
इस अन्याय से शेर अली खान का भरोसा अंग्ररेजी राज और अंग्रेजी हुकूमत से उठ गया,
उसको अब एहसास हुआ की जिनके लिए उसने ना जाने कितने अनजान और बेगुनाह लोगो का क़त्ल किया,आज वो ही लोग उसे बेगुनाह मानने को तैयार नही,पहली बार उसे ये एहसास हुआ की किसी अंग्रेज पर कत्ल का मुकदमा चलने से पहले उसे बिरटेंन वापिस बेझ दिया जाता था,आज उसे बचाने वाला कोई नही था,कियुंकी वो अंग्रेज नही बल्कि भारतीय हे।उसने इस मौत की सजा को चुनोती दी,और हायर कोर्ट मे अपील डाली|
ओर हायर कोर्ट के जज कर्नल पालक ने उसकी मौत की सजा बदल कर उसे आजीवन कारावास मे बदल दिया,और शेर अली खान को काला पानी अंडमान बेझ दिया,यहाँ तीन से चार साल सजा काटने के बाद उसकी मुलाक़ात यहाँ बन्द स्वतंत्रता संग्राम के  सेनानियों से हुई,
हालांकि उस वक्त तक क्रांतिकारी आंदोलन इतना भड़का नही था,फिर भी अंग्रेज विरोधी भावनाएं मजबूत्त हो रही थी,
जो लोग यहाँ केद थे वो सभी अंग्रेज राज के दुश्मन थे,
शेर अली की योजना मे अपने आपको अच्छे व्यवहार मे शामिल करना था,जो उसकी बदले की आग का हिस्सा था,उसे हर हाल मे कुछ एइसा करना था जिस से पूरी सरकार हिल जाए,इसी योजना को अमली जामा पहनाने मे उसने हर उस काम को अपनाया जिस से उसकी राह आसान हो सके।
इस व्यवाहरिक परिवर्तन ने सन 1871 मे उसको जेल मे नाई का काम करने को मिला,अब उसके हाथ मे उस्तरा और कैंची आसानी से आ गई, उसे बाल नही बल्कि अंग्रेज राज की गर्दन काटनी थी,------
यहाँ उस समय खुली जेल थी और यहाँ से भागना नामुमकिन था----
-----------------सन 1871 मे शेर अली पठान को पोर्ट ब्लयेर मे नाई का काम करने को मिल गया,अब उसकी इच्छा और वो विचार जो बरसो से सुलग रहा था, मानो उसकी पहली सीढ़ी उसे मिल गई, इस दौरान शेर अली अपने व्यवहार को बहुत लचीला और नरम बना रखा,था,लेकिन उसने अपनी मंशा अपने केदी साथियो को बता दी थी,की अगर बिर्टिश साम्राज्य को खत्म करना हे तो इनके सबसे बड़े अफसर का क़त्ल करना ज़रूरी हे, और ये होगा !और इसे मौका मिलते ही मे खुद करूँगा!!
यहाँ इसी व्यवहार के सत्यापन के लिए उसने जान बूझ कर वायसराय को सजा मुआफी का पत्र भी लिखा,जिसे बिर्टिश वायसराय ने ख़ारिज कर दिया था,
इसको बार बार एक बात खाती थी,की छोटा से छोटा अंग्रेज कितना बड़ा जुर्म कर दे,उसे कोई सजा नही,और उसको तिल तिल मरने के लिए काला पानी की सजा !
उसने अब ये तेह कर लिया की वो दो हत्याएं करेगा!
एक जेल सुप्रिंडेन्ट की !
दुसरी बिर्टिश वायसराय की!
उसे ये मौका भी मिल गया!
जब गवर्नर जनरल लार्ड मेयो ने अंडमान निकोबार की पोर्ट ब्लेयर मे सेल्युलर जेल के केदियो की हालत जानने और सुरक्षा इंतजामात की समीक्षा करने के लिए वहां का दौरा करने का मन बनाया!
शायद मेयो का काम पूरा भी हो चूका था,
शाम को 7 बजे का वक़्त था,लार्ड मेयो अपनी बोट की तरफ वापिस आ रहा था,लेडी मेयो बोट मे लार्ड का इंतेजार कर रही थी!वायसराय का कोर सेकियोरिटी दस्ता जिसमे 12 अफसर शामिल थे,साथ चल रहे थे,
इधर शेर अली आफरीदी ने भी ये तेह कर लिया था कि आज अपना मिशन पूरा करना हे, जिस काम के लिए वो एक मुद्दत और शिद्दत से इंतेजार मे था!वो मौका आज उसे मिल गया!
शायद सालो तक ये मौका दोबारा उसे नही मिलना हे !
शेर अली खुद इस सुरक्षा दस्ता मे काम कर चुका था,इस लिए वो ये भी जानता था कि सुरक्षा दस्ता कब और कहा कैसे चूक करता हे।और प्रहरी कहा लापरवाह हो जाते हे।हथियार उसके पास था ही,उसके नाई वाले काम का धारधार उस्तरा !
शेर अली ये भी जानता था,की अगर वायसराय बच गया तो मिशन भी अधूरा रह जाएगा और उसका भी बुरा हाल कर दिया जाएगा!
साथ ही वो ये भी जानता था कि यहाँ से बच निकलने का कोई रास्ता भी नही हे,
वायसराय जैसे ही बोट की तरफ बढ़ा!
और उसका सुरक्षा दस्ता भी बेफिक्र हो गया कि चलो आज का दिन तो ठीक ठाक गुजर गया!
वैसे भी वायसराय तक पहुचने की हिम्मत कौन कर सकता हे/
जैसे की आज प्रधान मंत्री की सुरक्षा को कौन भेद सकता हे!
लेकिन उनकी यही सोच उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल भी साबित हुई।
पोर्ट पर उस वक़्त अन्धेरा था,उस समय रौशनी के इंतजामात बहुत अछे नही थे!
फरवरी के माह मे वैसे भी जल्दी अन्धेरा हो जाता हे,
इस समय ।
बिजली की तरह एक साया छलावे की तरह वायसराय की तरफ झपटा!जब तक खुद वायसराय या सुरक्षा दस्ता के अफसर कुछ समझते इतने मे तो वायसराय खून मे सरोबार हो चुका था!लार्ड मेयो की मौके पर ही मौत हो गयी!!
शेर अली को मौके से ही गिरफ्तार कर लिया!इस बडे कारनामे से बिर्टिश का पूरा साम्रजाय दहल गया,बात लंदन तक पहुंची!तो इस को सुनकर हर कोई स्तब्ध था!
जब हिन्दोस्तां म वायसराय के साथ ये हो सकता हे तो !कोई भी अंग्रेज हिन्दुस्तान मे खुद को सुरक्षित नही मॉन सकता था!
शेर अली की गिरफ्तारी के बाद उस से जम कर पूछ ताछ हुई!
उसने मानो एक वाक्य रट रखा था!
मुझे मेरे अल्लहा ने एइसा करने का हुक्म दिया है।
मेने अल्लाह की मर्जी पूरी की हे!!
अंग्रेज इसी कोशिस मे लगे रहे आखिर शेर खान के पीछे किस संघटन या राजा का हाथ हे, लेकिन वो यही हंस हंस कर कहता था!!
फिरंगियों -------
भारत छोड़ो--- भारत छोड़
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बिर्टिश साम्रजाय के खिलाफ कोई विदेशी ताक़त तो नही,इस बात को खांगलाने के लिए पूरी ताकत उस बहादुर शेर अली पर ज़ुल्मो सितम की हद तक लगा दी गयी!
शेर पर जी भरकर जल्लादों ने जुल्म तोड़े,उसे इतना लोहा पहनाया गया जो उसके खुद के वजन से दो गुना था,फिर भी वो मुस्कुरा कर कहता था,जो मुझे करना था वो कर दिया अब जो तुम्हे करना हे करो@
लेकिन मे ख़ुदकुशी नही करूँगा कियुंकी मेने सुना हे की हजऱत बिलाल भी तपते रेगिस्तान पर कभी आहद को नही भूले!!
वाह !
और तुम मुझे बगेर उसकी मर्जी के मार भी नही पाओगे।
उन पर खुल कर हंसता भी था!!
कमाल का था शेर अली पठान।
उनको कुछ भी सुराग नही मिला,इधर शेर खान बन्द बंदियों की हौसला अफजाई करता ,और कहता मेरी तरह आजादी के लिए मजबूत्त होकर लड़ना इनको भागना होगा,अब ये हर पल ख़ौफ़ मे जिएंगे।
सभी केदी उस वक्त अंग्ररेजी साशन के खिलाफ थे,
इसी समय सेल्युलर जेल मे बहावी आंदोलन जो भूमि सुधार के लिए था,कुछ अनुयायी बन्द थे,
लेकिन बहुत ज्यादा तकलीफ ये बात देती हे जब कुछ इतिहासकार ये लिखते हे की मुसलमानों को मुगलों की गद्दी छीने जाने की टीस थी!
जफर की गद्दी से भारतीय मुसलमानों को कोई मतलब नही था!
कुछ इतिहासकारो ने शेर अली को पहला जेहादी भी घोषित किया?जो किसी भी सूरत मे न्याय संगत नही!!
इस महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी के साथ खुला पक्ष पात और अन्याय हे।
शेर अली एक ज़िंदा दिल इंसान ईमान से भरपूर था जो गुलामी के एहसास से जी भर कर कामयाब होकर लड़ा।
शेर अली ने अपने ब्यान मे गुलामी के बदतर हालात पर भी चर्चा की!
वो यक़ीनन एक लड़ाकू तो था !लेकिन पढ़ाकू नही!
सबसे खास बात !
जिस तरह असेम्बली काण्ड से पहले शहीद भगत सिंह ने अपना हेट वाला फोटो पहले ही अखबारों मे बेझने की व्यवस्था कर दी थी,
इसी तरह शेर अली को भी अपनी गिरफ्तारी के बाद अपना फोटो खिंचवाने मे काफी दिलचस्पी थी,
शायद वो इस बात का ख्वाईश मन्द था कि भारत की आने वाली नस्ले उसे इस बड़े काम के लिए सदा सदा याद रखेंगी।सन 11 मार्च 1873 को अंडमान निकोबार के वाइपर आइलैंड पर शेर अली को फांसी दे दी गयी।
जेल मे उसके सेल के साथियो से भी जब पूछा गया एक केदी ने बताया कि शेर अली हमेशा कहता था,अंग्रेज मेरे भारत से जब भागेंगे तब इनके सबसे बड़े अधिकारी को मारा जायेगा!और वायसराय ही सबसे बड़ा अधिकारी था जिसे मौत के घाट उतारा था शेर अली ने।
उसकी हत्या के बाद वाकई खोफ आ गया था बिर्टिश साशन मे!इस खबर को ज्यादा तवज्जो देने से बचा गया!और शेर अली को चुप चाप फांसी पर लटकाया गया।लन्दन टाइम्स परिवार के जिस रिपोर्टर ने शेर अली की फांसी को कवर किया,उसने लिखा!
जेल आफिसर ने उस से आख़री इच्छा जैसी बात पूछी तो उसने मुस्कुरा कर कहा
     "नही -साहेब"
लेकिन फांसी से पहले इस मुजाहिद ने किबला रुख मुह करके नमाज अदा  जरूर की@
अंग्रजो की तरह बाकी भारतीय इतिहासकारो ने भी शेर अली के इस काम को व्यक्तिगत बदला माना!
किसी ने ये कियु नही सोचा की!
अगर उसे बदला ही लेना होता तो वो उसे मारता जिसने उसे गिरफ्तार किया?
उसे बदला ही लेना होता तो वो उस जज को मारता जिसने उसे पहले फांसी की सजा दी?
उसने सीधे वायसराय को कियूं मारा?
वो कियु अंग्रेजो को भारत से निकालने लायक ख़ौफ़ उनके मन मे भरने के लिए वायसराय के कत्ल का सपना अपने साथी कैदियों को कियु बतलाया?
जो भी हो --------
यहाँ दिलचस्प ये भी ह की उसी दौर मे महाराष्ट्र का एक वीर सपूत बासुदेव बलवंत फड़के अपनी युवा सेना के जरिये अंग्रेजी हुकूमत पर कहर बन कर टूट रहा था !उसको भी हमारे कमजर्फ इतिहासकार सालो तक डकैत ही लिखते और कहते रहे
शेर अली तुम सच्चे शहीद थे,रहोगे सदा सदा!
और इस्लाम मे वतन परस्ती का और उस से मुहब्बत का सिला इंशा अल्लहा तुमको ज़रूर मिलेगा!!नस्ले आप पर फख्र करेंगी।
समाप्त
मोहम्मद क़ासिम मेवाती
बाझोट इस्माइलपुर राजस्थान भारत।